
बकरियों को बहुत मजबूत मान जाता है. मौसम कैसा भी हो, लेकिन वो जल्द ही उसके हिसाब से अपने को ढाल लेती हैं. लेकिन इस सब के बावजूद गोट एक्सपर्ट बदलते मौसम के हिसाब से ही उनके लिए शेड तैयार करने की सलाह देते हैं. क्योंकि जब मौसम बदलने लगे तो बकरियां तनाव में नहीं आएं और उनका उत्पादन भी बना रहे कम न हो. शेड में बदलाव करने की सलाह इसलिए भी दी जाती है क्योंकि ठंड के मौसम में जमीन की ठंडक और बकरियों का यूरिन उनके लिए जानलेवा हो सकता है. बकरियों और उनके बच्चों को इसी तरह की परेशानियों से बचाने के लिए अब बाजार में रेडीमेड गोट शेड भी आ रहे हैं.
प्लास्टिक के ये गोट शेड दो मंजिला तक होते हैं. ये ऐसे शेड होते हैं जहां बड़ी बकरियों और उनके बच्चों को साथ रखा जा सकता है. ये सर्दी और बरसात के दिनों में बहुत काम आते हैं. क्योंकि होता ये है कि अगर पशुओं के बाड़े में थोड़ा सा भी पानी भर जाए तो उन्हें पूरी रात खड़े-खड़े गुजारनी पड़ती है. पानी जमा होने से बीमारी फैलने का खतरा भी बना रहता है. बारिश के मौसम में डायरिया, खुरपका-मुंहपका और पेट के कीड़ों जैसी तमाम बीमारी होने का खतरा बना रहता है.
गोट एक्सपर्ट की मानें तो दो मंजिला मकान से जगह की कमी और बचत तो होती ही है, साथ में इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि बकरी के बच्चे बीमारियों से बच जाते हैं. वो बीमारियां जिन पर अच्छी खासी रकम खर्च हो जाती है. इस तरह के मकान में नीचे बड़ी बकरियां रखी जाती हैं. वहीं ऊपरी मंजिल पर छोटे बच्चे रखे जाते हैं. ऊपरी मंजिल पर रहने के चलते बच्चे मिट्टी के संपर्क में नहीं आ पाते हैं तो इससे वो मिट्टी खाने से भी बच जाते हैं. वर्ना छोटे बच्चे मिट्टी खाते हैं तो इससे उनके पेट में कीड़े हो जाते हैं.
बकरियों के लिए बनने वाले प्लास्टिक के इस दो मंजिला मकान में ऊपरी मंजिल की मेंगनी और बच्चों का यूरिन नीचे बड़ी बकरियों पर न गिरे इसके लिए बीच में प्लास्टिक की एक शीट लगाई जाती है. शीट की इस छत का ढलान इस तरह से दिया जाता है कि यूरिन और मेंगनी मकान के किनारे की ओर गिरती हैं. दो मंजिला मकान के इस मॉडल में बकरी की मेंगनी सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आती है. जिससे मेंगनी पर मिट्टी नहीं लगती है और उसकी खाद बनाने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती है. और इस तरह से मेंगनी के अच्छे दाम भी मिल जाते हैं.
रेडीमेड मकान का दूसरा पहलू यह भी है कि बकरियों के शेड में बहुत सारा चारा जमीन पर गिर जाता है. जिसके चलते चारे पर बकरी का यूरिन और मेंगनी (मैन्योर) भी लग जाता है. बकरी या उनके बच्चे जब इस चारे को खाते हैं तो इससे भी वो बीमार पड़ जाते हैं. इतना ही नहीं अगर जमीन कच्ची नहीं है तो यूरिन से उठने वाली गैस से भी बकरी और उनके बच्चे बीमार पड़ जाते हैं.
एक बड़ी बकरी को डेढ़ स्क्वायर मीटर जगह की जरूरत होती है. हमने दो मंजिला मकान का जो मॉडल बनाया है वो 10 मीटर चौड़ा और 15 मीटर लम्बा है. इस मॉडल मकान में नीचे 10 से 12 बड़ी बकरी रख सकते हैं. वहीं ऊपरी मंजिल पर 17 से 18 बकरी के बच्चों को बड़ी ही आसानी से रख सकते हैं. और इस साइज के मकान की लागत 1.80 लाख रुपये आती है. इस मकान को बनाने में इस्तेमाल होने वाली लोहे की एंगिल और प्लास्टिक की शीट बाजार में आसानी से मिल जाती है. रहा सवाल ऊपरी मंजिल पर बनाए गए फर्श का तो कई कंपनियां इस तरह का फर्श बना रही हैं और आनलाइन मिल भी रहा है.
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