
देश के कई जिलों में पशुओं में लंपी बीमारी फैलने की खबर है. सबसे पहले हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से खबर आई जहां चार बछड़ों की मौत हो गई, 48 मवेशी संक्रमित पाए गए. इस घटना से ठीक पहले दिल्ली सरकार ने लंपी बीमारी को लेकर अलर्ट जारी किया. विकास मंत्री कपिल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली सरकार पशुओं में लंपी स्किन बीमारी को फैलने से रोकने के लिए पूरी तरह सतर्क है और इस साल अब तक राजधानी में इसके कुछ ही मामले सामने आए हैं. अभी हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बीमारी का अलर्ट देते हुए किसानों के लिए एडवाइजरी जारी की और सावधान रहने को कहा. लंपी बीमारी की इन तमाम चुनौतियों के बीच एक बड़ा सवाल है कि क्या संक्रमित पशु का दूध सुरक्षित होता है, या उसमें भी संक्रमण का अंदेशा है?
इस सवाल के जवाब में जयपुर के वेटनरी डॉक्टर किशन यादव ने 'किसान तक' से विस्तार से बात की. डॉ. यादव ने कहा कि संक्रमित पशु का दूध बिल्कुल सुरक्षित है और उसका इस्तेमाल किसी भी तरह से खतरनाक नहीं है. डॉ. यादव के मुताबिक, पशुओं की लंपी बीमारी जूनोटिक श्रेणी में नहीं आती, इसलिए मवेशियों से इंसानों में संक्रमण नहीं फैलता. हालांकि दूध पीने से पहले अच्छी तरह से उबाल लेना चाहिए, अगर पाश्चुराइज्ड हो जाए तो बहुत अच्छा. दूध उबाले जाने के बाद संक्रमण का खतरा पूरी तरह खत्म हो जाता है.
लंपी का संक्रमण पशुओं में तेजी से फैलता है क्योंकि यह छुआछूत की बीमारी है. बीमारी का असली वेक्टर (फैलाने वाला एजेंट) वायरस है, इसलिए संक्रमण फैलने की रफ्तार बहुत अधिक होती है. जिस तरह इंसानों में वायरस का कोई इलाज नहीं है, उसी तरह पशुओं में भी वायरस से फैलने वाली बीमारी लंपी का भी इलाज नहीं है. हालांकि इसे रोकने के लिए पशुओं को लाइव वैक्सीन दिया जाता है जो कि बीमार होने से पहले का काम है. अगर कोई पशु लंपी की चपेट में आ गया है तो साफ-सफाई और सावधानी, परहेज ही असली उपाय है.
डॉ. यादव कहते हैं कि मवेशी को लंपी बीमारी होने के बाद घर पर भी आसानी से इलाज कर सकते हैं. अंग्रेजी दवा के बजाय घर पर प्राकृतिक और देसी नुस्खे से भी इस बीमारी को ठीक किया जा सकता है. दरअसल, इस बीमारी का सबसे बड़ा संकेत पशु के माथे, गर्दन, पैर आदि पर गांठों के रूप में देखा जाता है जिसका साइज 5 सेमी तक हो सकता है.
तबीयत ज्यादा खराब होने पर गांठों से पानी या मवाद आने लगता है. इस डिस्चार्ज की वजह से दूसरे पशु में भी लंपी का संक्रमण फैल सकता है, इसलिए गाठों या जख्म को हमेशा साफ रखना या सैनिटाइज करना जरूरी होता है. इसके लिए किसान घर में ही नीम के पत्तों को उबालकर घोल बना सकते हैं. उस घोल में फिटकरी मिला दें तो और भी अच्छा. इस घोल से समय-समय पर बीमार पशु के घाव को धोते रहें. इससे घाव जल्द सूखता है और पशु को बहुत आराम मिलता है.
संक्रमित पशु की नाजुक स्थिति को जानने के क्या लक्षण हैं? इस बारे में डॉ. यादव ने कहा कि जब पशु में निमोनिया के लक्षण दिखने लगें, पशु तेज-तेज हांफने लगे, मुंह से लार आए, आंखों से पानी गिरने लगे और पशु बेचैनी में दिखे तो किसान को सावधान हो जाना चाहिए. यह हालत बेहद नाजुक स्थिति का संकेत देती है.
लंपी बीमारी के खतरे का अंदाजा इस बात बात से लगा सकते हैं कि देश के अभी 220 जिले इसकी चपेट में हैं जिसमें सबसे अधिक प्रभाव बिहार में है. बिहार में 27 जिले, तमिलनाडु में 25 और राजस्थान में 18 जिले प्रभावित बताए जा रहे हैं.