
गोट एक्सपर्ट की मानें तो बकरी पालन अब गांव तक की सीमति नहीं रह गया है. शहरों में भी खूब बकरी पालन किया जा रहा है. बड़े-बड़े बकरी फार्म शहरों में खुल रहे हैं. यहां तक की बकरे-बकरियों की ऐसी नस्ल भी हैं जिन्हें घर की छत पर रखकर भी पाला जा सकता है. शहर में तो बकरी पालन को अब रोजगार की तर्ज पर किया जा रहा है. जो बकरे-बकरी पालकर कारोबार करना चाहते हैं तो ऐसे लोगों को केन्द्र और राज्य सरकार बकरी पालन की ट्रेनिंग भी दे रही है.
लेकिन बकरी पालन करने से पहले ये जरूर तय कर लेना चाहिए कि आप किस लिए करना चाहते हैं. जैसे दूध के लिए या मीट के लिए. आज भी बाजार में बकरी के दूध से ज्यादा उसके मीट की डिमांड है. देश के कुल दूध उत्पादन में बकरियों के दूध का योगदान करीब साढ़े तीन फीसद है. अगर आप मीट के लिए बकरा पालन करना चाहते हैं तो खास तीन नस्ल पालकर अपना कारोबार शुरू कर सकते हैं.
गुजरी नस्ल खासतौर पर राजस्थान के अलवर में पाई जाती है. इस नस्ल के बकरे का औसत वजन 69 और बकरी का 58 किलो तक होता है. लेकिन ज्यादातर महाराष्ट्र में इस नस्ल के बकरे की स्पेशल तरीके से खिलाई कर उसे वजनी बनाया जाता है. जानकारों की मानें तो बकरा 150 किलो के वजन को भी पार कर जाता है. इस नस्ल की बकरी रोजाना औसत 1.60 किलोग्राम तक दूध देती है. यह सफेद और भूरे रंग की होती है. इसके पेट, मुंह और पैर पर सफेद धब्बे होते हैं.
सोजत नस्ल की बकरी नागौर, पाली, जैसलमेर और जोधपुर में पाई जाती है. यह जमनापरी की तरह से सफेद रंग की बड़े आकार वाली नस्ल की बकरी है. इसे खासतौर पर मीट के लिए पाला जाता है. इस नस्ल का बकरा औसत 60 किलो वजन तक का होता है. बकरी दिनभर में एक लीटर तक दूध देती है. सोजत की नार्थ इंडिया समेत महाराष्ट्रा में भी खासी डिमांड रहती है.
कोटा, बूंदी, बांरा और सवाई माधोपुर में करोली नस्ल की बकरियों खूब पाली जाती हैं. औसत 1.5 लीटर तक दूध रोजाना देती हैं. लेकिन स्थानीय लोगों की मानें तो राजस्थान और यूपी के लोकल बाजारों में इसके मीट की खासी मांग है. इसका पूरा शरीर काले रंग का होता है. सिर्फ चारों पैर के नीचे का हिस्सा भूरे रंग का होता है. इसकी एक खास बात यह भी है कि सिर्फ मैदान और जंगलों में चरने पर ही यह वजन के मामले में अच्छा रिजल्ट देती है.
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