
बढ़ता तापमान, भीषण गर्मी और गर्म हवाओं के चलते मछलियों के तालाब का पानी बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है. और जैसे ही तालाब का पानी गर्म होता है तो मछलियां परेशान होने लगती हैं. यहां तक की इस गर्म पानी का असर मछलियों के फीड (दाने) पर भी पड़ता है. ऐसे में मछलियां ऐसी जगह पर फीड चाहती हैं जहां पानी गर्म न हो. फिशरीज एक्सपर्ट की मानें तो अलग-अलग प्रजाति की मछलियां तालाब में अलग-अलग जगहों पर रहती हैं. आप जब मछलियों के तालाब में नजर दौड़ाएंगे तो कुछ मछलियां आपको मोटी ताजी दिखाई देंगी और कुछ मछलियां एकदम कमजोर.
ये परेशानी किसी दो-चार मछली पालकों की नहीं है, ज्यादातर मछली पालक इस परेशानी से जूझते रहते हैं. एक्सपर्ट की मानें तो इस परेशानी की वजह खुद मछली पालक हैं. और इसका समाधान भी उन्हीं के हाथ में है. क्योंकि जब मछली पालक तालाब में फीड डालते हैं तो वो सही तरीके से मछलियों तक नहीं पहुंच पाता है. खासतौर से पानी ज्यादा गर्म होने पर. क्योंकि मछलियां अपनी आरामदायक जगह से बाहर नहीं निकलती हैं. ऐसे में तीन खास जगहों पर मछलियों के लिए फीड देना जरूरी हो जाता है.
फिशरीज एक्सपर्ट का कहना है कि बाजार में रोहू मछली बहुत पसंद की जाती है. इसके मीट में बहुत स्वा द होता है. इसका मीट नरम भी होता है. यूपी, दिल्लीछ-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थाेन में रोहू की डिमांड पूरी करने के लिए तालाबों में रोहू मछली खूब पाली जाती है. जब तालाब में मछलियों के लिए दाना डाला जाता है तो रोहू तालाब की तली से दो फुट ऊपर और तालाब की सतह से दो फुट नीचे बीच में आकर दाना खाती है.
नरेन मछली को नॉर्थ इंडिया में नैनी के नाम से भी जाना जाता है. पेट भरने के लिए नैनी तालाब के तले में रहकर ही इंतजार करती है. बेशक मछली पालक दाना डालने में कितनी ही देर कर दे, लेकिन नैनी तालाब की सतह पर जाकर दाने की तलाश नहीं करती है. वैसे भी नैनी को तालाब की तली में ही रहना ज्याबदा पसंद है.
नॉर्थ इंडिया में रोहू के बाद खाने के लिए अगर किसी और मछली को पसंद किया जाता है तो वो कतला है. फिश फ्राई में भी कतला मछली का खासा चलन है. बाजार में एक से डेढ़ किलो वजन की कतला मछली हाथों-हाथ बिकती है. लेकिन अपना पेट भरने के लिए कतला तालाब की सतह पर ही रहकर इंतंजार करती है.
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