
Future Milk फ्यूचर मिल्क की चर्चा तेज होती जा रही है. फ्यूचर मिल्क को सिर्फ एक दूध के रूप में ही नहीं दवाई के तौर पर भी देखा जा रहा है. साथ ही इस बहाने उन पशुओं के पालन को बढ़ावा देने की भी कोशिश हो रही है जो संख्या में घट रहे हैं. ऊंट और याक इसका बड़ा उदाहरण है. बीते कुछ वक्त पहले नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनडीआरआई), करनाल, हरियाणा में भी फ्यूचर मिल्क को लेकर चर्चा हो चुकी है. और अगर अब की बात करें तो आने वाली फरवरी में फ्यूचर मिल्क को लेकर एक बड़ी चर्चा होने जा रही है.
तीन दिन 9 से 11 फरवरी तक ये चर्चा आनंद, गुजरात में होगी. नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) और इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन (आईडीएफ) मिलकर इस कार्यक्रम को आयोजित कर रहे हैं. एनिमल रिसर्च और डेयरी सेक्टर से जुड़े एक्सपर्ट का मानना है कि देश के कुछ प्राचीन पशु जिनका इस्तेमाल कई तरह के काम में किया जाता था उनकी संख्या अब घटने लगी है. ऐसे में उनको बचाने के लिए एक मात्रा रास्ता दूध ही बचता है. अगर उनके दूध की डिमांड बढ़ जाए तो पशुपालक उन्हें पालने में भी दिलचस्पी दिखाएंगे.
NDRI के डायरेक्टर डॉ. धीर सिंह का कहना है कि आज मानव स्वास्थ्य के लिए लिपिड, लैक्टोज, इम्युनोग्लोबुलिन, विभिन्न पेप्टाइड्स, न्यूक्लियोटाइड्स, ओलिगोसेकेराइड और मेटाबोलाइट्स आज की भागम भाग वाली जिंदगी और खानपान में ये बहुत फायदेमंद साबित हो सकते हैं. और इनकी पूर्ति नॉन बोवाइन पशुओं के दूध से हो सकती है. बस जरूरत इतनी है कि हम दूध में इनकी तलाश करें.
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