केज कल्चर से इस किसान ने शुरू किया मछलीपालन, कमाई बढ़ाने के लिए लगाई ये नई तकनीक

केज कल्चर से इस किसान ने शुरू किया मछलीपालन, कमाई बढ़ाने के लिए लगाई ये नई तकनीक

केज कल्चर मछली पालन की एक ऐसी तकनीक है, जिसमें जलाशय में एक निर्धारित स्थान पर फ्लोटिंग केज यूनिट बनाई जाती है. सभी यूनिट एक दूसरे से जुड़ी होती हैं. एक यूनिट में चार बाड़े होते हैं. एक बाड़ा 6 मीटर लंबा, 4 मीटर चौड़ा और 4 मीटर गहरा होता है.

केज कल्चर से कमा रहे लाखों का मुनाफाकेज कल्चर से कमा रहे लाखों का मुनाफा
क‍िसान तक
  • Munger,
  • Jun 20, 2024,
  • Updated Jun 20, 2024, 12:53 PM IST

मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए मुंगेर जिले में पहली बार केज कल्चर तकनीक का उपयोग कर मछली उत्पादन शुरू किया जा रहा है. केज कल्चर को नेट पेन कल्चर भी कहा जाता है. इसके लिए खड़गपुर झील का चयन किया गया है और पानी पर 17 यूनिट फ्लोटिंग केज लगाए गए हैं. जहां केज कल्चर तकनीक का उपयोग कर मछली पालन शुरू किया जा रहा है.

क्या है केज कल्चर?

केज कल्चर मछली पालन की एक ऐसी तकनीक है, जिसमें जलाशय में एक निर्धारित स्थान पर फ्लोटिंग केज यूनिट बनाई जाती है. सभी यूनिट एक दूसरे से जुड़ी होती हैं. एक यूनिट में चार बाड़े होते हैं. एक बाड़ा 6 मीटर लंबा, 4 मीटर चौड़ा और 4 मीटर गहरा होता है. बाड़े के चारों ओर प्लास्टिक का मजबूत जाल होता है. इसे कछुए या अन्य जलीय जीव काट नहीं सकते. पानी में तैरते इसी जाल के बाड़े में मछली पालन किया जाता है. इन जालों में उंगली के आकार की मछलियों को पालन के लिए छोड़ दिया जाता है. मछलियों को रोजाना दाना डाला जाता है. ये मछलियां पांच माह में एक से सवा किलो की हो जाती हैं. मछली पालन की यह तकनीक जलाशय मत्स्य विकास योजना के तहत शुरू की जा रही है. खास बात यह है कि जलाशय के मूल उद्देश्य को प्रभावित किए बिना मत्स्य उत्पादकता को बढ़ाना है.

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केज तकनीक के फायदे

तालाब या झीलों की तुलना में पिंजरों में मछलियां तेजी से बढ़ती हैं. इसमें मछलियां स्वस्थ और सुरक्षित रहती हैं. मछलियों को खिलाना भी आसान है. मछलियों के बीमार होने की संभावना कम होती है, क्योंकि बाहरी मछलियों के संपर्क में नहीं आना होता. इसमें संक्रमण का खतरा भी नहीं रहता. मत्स्यपालक अपनी जरूरत और मांग के अनुसार पिंजरे से मछलियां निकाल सकते हैं. जरूरत न होने पर मछलियों को पिंजरे में ही छोड़ा जा सकता है. इससे कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि मछलियों को और बढ़ने का मौका मिलता है. केज तकनीक के जरिए मत्स्यपालक कम लागत और कम समय में अधिक मुनाफा कमाते हैं. साथ ही मछली उत्पादन के मामले में जिला आत्मनिर्भर बन सकेगा. एक पिंजरे में 6 हजार तक फिंगर साइज की मछलियां पाली जा सकेंगी. इस तरह खड़गपुर झील में बने 17 केज यूनिट में 102 हजार से अधिक मछलियां पाली जा सकेंगी. वही प्रत्येक पिंजरे से 40 से 50 क्विंटल उत्पादन होगा.

सरकार से भी मिली मदद

जिला मत्स्य पदाधिकारी मनीष रस्तोगी ने बताया कि जिले में पहली बार केज कल्चर तकनीक से मछली उत्पादन शुरू किया जा रहा है. इसके लिए खड़गपुर झील में 17 केज कल्चर यूनिट लगाए गए हैं. यह तकनीक समय और लागत के लिहाज से मछली पालकों के लिए फायदेमंद है. उन्होंने बताया कि मछली पालकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य सरकार की जलाशय मत्स्य विकास योजना के तहत मछली पालक चंदन कुमार ने 51 लाख रुपये की लागत से यूनिट लगाई है, जिसमें सरकार लाभार्थी को 70 फीसदी अनुदान दे रही है.

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कई लोगों को मिल रहा रोजगार

मतस्य पालक चंदन कुमार ने बताया कि बिहार राज्य सरकार ने केज कल्चर के लिए ऑनलाइन आवेदन जारी किया था, जिसके बाद जिला मत्स्य विभाग के निर्देश पर ऑनलाइन आवेदन भरा गया. जिसके बाद मेरा चयन हुआ और छत्तीसगढ़ की एक एजेंसी ने खड़गपुर झील में केज कल्चर यूनिट स्थापित किया. यूनिट स्थापित करने के बाद हम मछली पालन कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि केज यूनिट स्थापित होने से लोगों को अब फ्रोजन मछली नहीं खानी पड़ेगी और ताजी मछलियां लोगों तक पहुंचेंगी. उन्होंने कहा कि इससे कई लोगों को रोजगार मिल रहा है. (गोविंद कुमार की रिपोर्ट)

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