
पशु छोटा हो या बड़ा उसे दिन में कम से कम एक बार खुले में चराने के लिए ले जाना जरूरी होता है. अगर आसपास छोटी सी भी खुली जगह नहीं है तो ये मजबूरी अलग बात है, वर्ना तो खुले में चराने से सेहत अच्छी रहती है. और ये फार्मूला उन सभी फार्म पर लागू होता है जहां 10 से लेकर 100 बकरियां तक पाली जाती हैं. गोट एक्सपर्ट की मानें तो बकरियों को तीन तरह से पाला जाता है. पहला चराकर, दूसरा खूंटे पर बांधकर और तीसरा चराने के साथ खूंटे पर बांधकर. लेकिन बरसात के दिनों में बकरियों को खुले में चराना और सर्तकता बरतने वाला काम होता है. खासतौर पर गर्भवती और दूध देने वाली बकरियों के मामले में.
एक्सपर्ट की मानें तो बकरियां दूसरे बड़े जानवरों की तरह से एक बार में पेट नहीं भरती हैं. थोड़ा-थोड़ा करके दिन में चार से पांच बार इन्हें खाने के लिए चाहिए होता है. बकरियों का चारा भी तीन तरह का होता है. हरा चारा, सूखा चारा और दाना. लेकिन इस सब के साथ यह ख्याल रखना भी बेहद जरूरी है कि बकरी जो खा रही है वो ठीक से हजम हो रहा है या नहीं.
गोट एक्सपर्ट की मानें तो जब बकरी को गर्भवती कराना हो तो उसी के साथ बकरी की खुराक बढ़ा दें. हरा चारा और दाने की मात्रा बढ़ा दें. गर्भवती कराने से दो हफ्ते पहले ही बकरी की सामान्य खुराक 3 किलो दाना प्रतिमाह में 100 से 200 ग्राम दाना और बढ़ा दें. इतना ही नहीं जब बकरी बच्चा देने वाली हो तो उससे एक-दो हफ्ते पहले सामान्य खुराक में दाने की मात्रा 300 से 400 ग्राम तक बढ़ा दें. बकरी को उत्तम किस्म का हरा चारा भी खिलाएं.
एक्सपट्र की मानें तो दूध देने वाली बकरी को भी ज्यादा खुराक की जरूरत होती है. एक लीटर तक दूध देने वाली बकरी को हर रोज 300 ग्राम तक दाना खिलाना चाहिए. दाना दिन में कम से कम दो बार में दें. साथ ही दिनभर में हरा और सूखा चारा मिलाकर करीब 4 किलो वजन तक खाने को दें. सामान्य मौसम में 20 किलो वजन की बकरी को 700 एमएल तक पानी पिलाना चाहिए. वहीं गर्मी के मौसम में यह मात्रा डेढ़ गुनी कर देनी चाहिए.
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