
चीन, अमेरिका से लेकर यूरोपीय संघ (EU) तक जिस भारतीय झींगे के स्वाद के दीवाने हैं, और जिसने ग्लोबल मार्केट में धुरंधर खिलाड़ी इक्वाडोर की नाक में दम कर रखा है, उस पर आज एक बड़ा संकट मंडरा रहा है. अमेरिका द्वारा लगातार टैरिफ बढ़ाए जाने के बावजूद जिसकी डिमांड अंतरराष्ट्रीय बाजार में टस से मस नहीं हुई, उसे अब अपनों की ही लापरवाही का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. बीते एक साल में यूरोपीय संघ, जापान, रूस और यूएसए जैसे महाशक्तियों ने भारत से गई झींगे की एक या दो नहीं, बल्कि पूरी 35 खेप को रिजेक्ट कर वापस भारत लौटा दिया है.
सरकारी रिपोर्टों ने इस झटके के पीछे की जो कड़वी सच्चाई उजागर की है, वो बेहद चौंकाने वाली है. सालाना 7.5 लाख टन झींगे का बम्पर एक्सपोर्ट करने वाले भारत की इन खेपों में प्रतिबंधित एंटीबायोटिक्स दवाओं (नाइट्रोफरान्स और क्लोरैम्फेनिकॉल) के अंश पाए गए हैं. एक तरफ जहां भारतीय झींगे का डंका बज रहा है और खरीदारों की लिस्ट में नए-नए देश जुड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एंटीबायोटिक्स की इस मिलावट ने इंटरनेशनल मार्केट में भारत के एक्सपोर्टर्स की साख पर बट्टा लगा दिया है. टैरिफ के ऊंचे पहाड़ों को पार करने वाले भारतीय झींगे के सामने अब खुद की 'क्वालिटी और शुद्धता' साबित करने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.
मत्स्य पालन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, एंटीबायोटिक मानकों के उल्लंघन के कारण पिछले एक साल में अमेरिका, ईयू, जापान और रूस ने 35 खेपों में 548 टन भारतीय झींगा वापस लौटाया है, जिसकी कुल कीमत लगभग 40 करोड़ रुपये है. सर्वाधिक 22 खेपें अमेरिका द्वारा लौटाई गई हैं, जो भारतीय सी-फूड की गुणवत्ता और निर्यात पर बड़ा झटका है. वहीं यूरोपीय संघ ने नौ, जापान ने तीन और रूस ने भारतीय झींगा की एक खेप को रिजेक्ट करके बैरंग भारत लौटा दिया है.
वाणिज्य विभाग की एक संस्था है निर्यात निरीक्षण परिषद (ईआईसी). ईआईसी द्वारा निर्यात से पहले होने वाले जांच तंत्र को मजबूत बनाया जाता है. साथ ही शिकायत आने पर जांच भी की जाती है. लेकिन इस सब के बावजूद भारत से विदेश पहुंच रहे झींगा कंसाइनमेंट में एंटी बायोटिक्स दवाईयों के अंश पाए जाते हैं. इस बारे में जब झींगा किसान और झींगा एक्सपोर्टर से बात की गई तो उनका कहना है कि सरकार इस मामले में सख्त कदम नहीं उठाती है.
हमारा 7.5 लाख टन झींगा बिक जाता है, लेकिन 547 टन झींगा में शिकायत आ जाती है. अब ये कैसे मुमकिन है. जब हमारा झींगा भारत में होने वाली जांच में पास हो जाता है तो विदेश जाते ही वो खराब कैसे हो जाता है. अब या तो वहां पर दोबारा से महंगी जांच कराएं, या फिर कुछ कम दाम पर उसी झींगा को वहीं बेच दें.
पीआईबी के मुताबिक देश में झींगा उत्पादन 11 लाख टन को पार कर गया है. कुछ वक्त पहले तक ये 8.5 से 9 लाख टन के बीच में था. लेकिन साल 2025-26 के झींगा उत्पादन के आंकड़ों की बात करें तो वन्नामेई झींगा का उत्पादन 10.5 लाख टन पर पहुंच गया है. जबकि ब्लैक टाइगर ने अच्छी वापसी करते हुए 66500 अन के आंकड़े को छुआ है. वहीं पोस्ट-लार्वा स्टॉकिंग का आंकड़ा भी अच्छा है. देश में स्टॉकिंग आंकड़ा 990000 टन के पार पहुंच गया है. इसके चलते आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में लगातार विस्तार देखने को मिल रहा है.
2026 की शुरुआत के एक्सपोर्ट आंकड़े बताते हैं कि झींगा का एक्सपोर्ट पैटर्न बदल रहा है. जनवरी में कुल एक्सपोर्ट करीब 50 हजार टन रहा था, जो बीते साल की तुलना में मामूली सा ही ज्यादा था. लेकिन झींगा निर्यात वित्त वर्ष 2025-2026 की बात करें तो झींगा एक्सपोर्ट ने रिकॉर्ड 5.51 बिलियन अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को छू लिया है. वहीं अगर कुल सीफूड एक्सपोर्ट को देखें तो एक्सपोर्ट में जमे हुए (फ्रोजन) झींगा का हिस्सा दो-तिहाई से ज्यादा रहा है. और ये तब है जब अमेरिकी टैरिफ का लगातार दबाव बाजार पर बना हुआ था.
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