
बीयर मुख्य रूप से जौ से बनाई जाती है. बीयर बनाने की इस प्रक्रिया में जौ को सड़ाया जाता है, जिसे हम 'फर्मेंटेशन' कहते हैं. जब बीयर तैयार हो जाती है, तो अंत में जो ठोस कचरा या अवशेष बचता है, उसे तकनीकी भाषा में 'स्पेन्ट ग्रेन' कहते हैं. पशुपालक इसे 'कुट्टा' या बीयर का वेस्ट भी कहते हैं. 100 लीटर बीयर बनाने के बाद लगभग 20 किलो गीला स्पेन्ट ग्रेन निकलता है. पशुपालकों के बीच इसके लोकप्रिय होने का मुख्य कारण ये है कि यह बहुत सस्ता मिलता है. इसमें प्रोटीन 18 फीसदी और फैट मात्र 16 फीसद तक होता है. इसके अलावा इसमें फाइबर, स्टार्च और सेल्यूलोज भी भरपूर मात्रा में होता है. चूंकि महंगाई के दौर में पशु आहार बहुत महंगा हो गया है, इसलिए पशुपालक दूध उत्पादन की लागत कम करने के लिए अपनी गाय और भैंसों को यह 'कुट्टा' खिलाते हैं. खिलाने में मुनाफे का सौदा लगता है क्योंकि इससे जानवर का पेट भी भरता है और दूध उत्पादन में भी मदद मिलती है, लेकिन इसके पीछे छिपे खतरों को समझना बहुत जरूरी है.
गाजियाबाद के उप जिला पशुचिकित्सा अधिकारी, डॉ. हरि बंश सिंह ने बताया कि भले ही स्पेन्ट ग्रेन यानि कुट्टा खिलाने से दूध उत्पादन में खर्चा कम आता हो, लेकिन अगर हम इसके रसायनिक गुणों को देखें तो यह पशुओं के लिए कई तरह से हानिकारक है. सबसे पहली और बड़ी समस्या यह है कि बीयर बनाते समय अनाज का लगभग सारा कार्बोहाइड्रेट 'फर्मेंटेशन' की वजह से अल्कोहल यानि शराब में बदल जाता है. पशु को ऊर्जा और ताकत के लिए कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है, जो इसमें बचता ही नहीं है. इसी कारण, जो दुधारू पशु केवल इसी पर निर्भर रहते हैं, उनमें 'हाइपोग्लाइसिमिया' यानी खून में शुगर की कमी होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. दूसरी समस्या यह है कि बीयर बनाने की प्रक्रिया में तेज गर्मी और रसायनों के कारण अनाज में मौजूद जरूरी विटामिन्स नष्ट हो जाते हैं. इसके अलावा, इसमें अल्कोहल की कुछ मात्रा रह जाती है. अगर पशु इसे लगातार खाता है, तो यह अल्कोहल उसके लीवर को खराब कर सकता है और उसके पाचन तंत्र को बिगाड़ सकता है.
डॉ. सिंह ने बताया कि बीयर बनाने में कई तरह के रसायनों और 'टैनिन्स' का प्रयोग होता है. टैनिन्स एक ऐसा तत्व है जो पशु के पेट में जाकर भोजन के प्रोटीन को शरीर में अवशोषित होने से रोकता है. दुधारू पशु का शरीर उस 'घटिया क्वालिटी' के प्रोटीन का इस्तेमाल नहीं कर पाता. साथ ही, यह गीला कचरा अक्सर खुले में पड़ा रहता है, जिससे इसमें हानिकारक बैक्टीरिया पनपते हैं जो पशुओं में 'फूड प्वाइजनिंग' का कारण बनते हैं. डॉ हरि बंश सिंह ने बताया कि स्पेन्ट ग्रेन यानि कुट्टा दुधारू पशुओं के लिए एक 'संतुलित आहार' बिल्कुल नहीं है. इसका प्रयोग कभी-कभार या बहुत सीमित मात्रा में तो ठीक हो सकता है, लेकिन इसे लम्बे समय तक पशुओं के लिए आहार के रूप में देना बेहद खतरनाक है.
डॉ. सिंह ने बताया इसके लगातार प्रयोग से पशु के पेट में मौजूद मित्र बैक्टीरिया जो खाना पचाने में मदद करते हैं, मरने लगते हैं. इससे पशु के पेट का सिस्टम खराब होता है, तो 'क्लोस्ट्रीडियम' जैसे जानलेवा बैक्टीरिया और हानिकारक फफूंद पेट में घर कर लेते हैं. कई बार संक्रमण इतना बढ़ जाता है कि पशु की मृत्यु भी हो सकती है. इसलिए डॉ. हरि बंश सिंह सलाह देते हैं कि पशुपालक केवल सस्ते के चक्कर में अपने कीमती पशुओं की जान जोखिम में न डालें. स्पेन्ट ग्रेन को कभी भी एकमात्र पशु आहार के रूप में इस्तेमाल न करें. इसे सूखे चारे, हरे चारे और उचित दाने के मिश्रण के साथ बहुत कम मात्रा में ही दें. याद रखें, पशु स्वस्थ रहेगा तभी वह लम्बे समय तक दूध दे पाएगा. सस्ते विकल्प के चक्कर में पशु के लीवर और पाचन तंत्र को खराब करना भविष्य में आपको भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा सकता है.
ये भी पढें-