
45 से 48 डिग्री तापमान, गर्मी संग लू के थपेड़े, बीच-बीच में उमस भरी दोपहर या शाम. कुछ ऐसा ही होता है गर्मियों वाला मई-जून का महीना. ऐसे में पानी की कमी के चलते दूध देने वाले पशुओं को परेशान करता हीट स्ट्रैस और डिहाईड्रेशन. ये देखने और सुनने में छोटी और एक आद परेशानी लग रही है, लेकिन पशुपालन में इसके नुकसान बहुत है. एनिमल एक्सपर्ट की मानें ते गर्मियों में पशुओं को सबसे ज्यादा परेशानी हीट स्ट्रैस और डिहाईड्रेशन के चलते होती है. इसीलिए कहा जाता है कि बदलते मौसम के हिसाब से पशुओं के शेड में बदलाव करना चाहिए.
पीने के पानी और चारे में भी मौसम के हिसाब से बदलाव करना होता है. इतना ही नहीं पशु को शेड से कब बाहर ले जाना है या फिर कब से कब तक शेड में ही रखना इसका पालन भी एनिमल एक्सपर्ट के मुताबिक ही करना चाहिए. पशुओं के हीट स्ट्रेस और डिहाईड्रेशन में आते ही उनका दूध उत्पादन घट जाता है. जबकि कम दूध देने की हालत में भी पशु चारा सामान्य दिना जितना ही खाता है.
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