Success Story: कोर्ट की जिरह नहीं, अब खेतों में क्रांति: वकील बेटी ने 'पिंजरा पद्धति' से बदली भेड़ पालन की तस्वीर

Success Story: कोर्ट की जिरह नहीं, अब खेतों में क्रांति: वकील बेटी ने 'पिंजरा पद्धति' से बदली भेड़ पालन की तस्वीर

कर्नाटक की अरुणा देवी ने साबित कर दिया कि अगर हुनर को सही तकनीक मिले, तो मिट्टी भी सोना उगलती है. पेशे से वकील रहीं अरुणा ने अपने माता-पिता की सेवा और खेती की विरासत को संभालने के लिए कोर्ट-कचहरी छोड़ दी. उन्होंने 'सिंगल सेल रैम फार्मिंग' (पिंजरा पद्धति) जैसी आधुनिक तकनीक अपनाकर भेड़ पालन को एक मुनाफे वाले बिजनेस में बदल दिया.

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जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • Feb 17, 2026,
  • Updated Feb 17, 2026, 5:36 PM IST

कर्नाटक के शिवमोग्गा की रहने वाली 45 वर्षीय अरुणा देवी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. बी.एससी. कृषि और फिर एलएल.बी. की डिग्री हासिल करने के बाद, उन्होंने वकालत की दुनिया में कदम रखा. लेकिन कोर्ट और कचहरी के बीच भी उनका दिल हमेशा अपनी मिट्टी और खेती-किसानी के लिए धड़कता रहा. उनके पति सरकार में एक बड़े अधिकारी थे, जिससे घर की आर्थिक स्थिति मजबूत थी, लेकिन अरुणा देवी कुछ ऐसा करना चाहती थीं जिससे वह अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा भी कर सकें और खेती में कुछ नया कर भी ला सकें. 16 वर्षों के लंबे कृषि अनुभव को आधार बनाकर साल 2021 में पहले उन्होंने भेड़ पालन के क्षेत्र में उतरने का फैसला किया. उन्होंने बाजार की नब्ज टटोली और पाया कि मीट की मांग लगातार बढ़ रही है. बस फिर क्या था, उन्होंने अपने 60x40 मीटर के छोटे से क्षेत्र में 18 लाख रुपये के निवेश के साथ भेड़ पालन का श्रीगणेश किया. यह कोई सामान्य शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक शिक्षित महिला द्वारा विज्ञान को व्यापार से जोड़ने की एक साहसी पहल थी.

पिंजरे में परवरिश और सुरक्षा का अनोखा विज्ञान

पारंपरिक भेड़ पालन में सबसे बड़ी समस्या चारे की तलाश में मीलों भटकना और झुंड में फैलने वाली बीमारियां होती है. अरुणा देवी ने महसूस किया कि जब भेड़ें खुले में चरती हैं, तो वे आपस में लड़ती हैं और परजीवियों के संपर्क में आकर बीमार हो जाती हैं. इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए उन्होंने 'सिंगल सेल रैम फार्मिंग' तकनीक अपनाई. इस पद्धति में हर नर भेड़ को एक अलग लकड़ी या लोहे के केबिन (पिंजरे) में रखा जाता है. इससे जानवरों के बीच की आक्रामकता पूरी तरह खत्म हो गई और उन्हें एक शांत, तनाव-मुक्त वातावरण मिला. पिछले एक साल में उनके फार्म पर बीमारी का एक भी मामला सामने नहीं आया है, क्योंकि यहां साफ-सफाई का उच्चतम स्तर बनाए रखा जाता है. यह तकनीक उन किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जिनके पास चराने के लिए बड़ी जमीन या चरागाह उपलब्ध नहीं हैं.

इस पद्धति में हर नर भेड़ को एक अलग लकड़ी या लोहे के केबिन (पिंजरे) में रखा जाता है

23 हजार की भेड़ में बदलता है 8 हजार का मेमना 

अरुणादेवी का बिजनेस मॉडल बहुत ही सटीक और वैज्ञानिक है. वह बाजार से 3 महीने के भेड़ के मेमने खरीदती हैं, जिनकी कीमत लगभग 6,000 से 8,000 रुपये होती है. इन बच्चों को वह अपने हाई-टेक शेड में 6 महीने तक पालती हैं. यहां सबसे अहम भूमिका 'कंट्रोल्ड फीडिंग' यानी संतुलित आहार की है. चूंकि भेड़ें पिंजरे में रहती हैं, इसलिए उनकी ऊर्जा चलने-फिरने में बर्बाद नहीं होती और पूरा पोषण उनके मांस और वजन को बढ़ाने में लगता है. अरुणा देवी हर भेड़ पर प्रति माह लगभग 1,000 रुपये चारे और रख-रखाव पर खर्च करती हैं. 6 महीने बाद जब भेड़ का वजन 50 किलो से ऊंपर पहुंच जाता है, तो वह उसे 450 रुपये प्रति किलो के हिसाब से 22,000 से 23,000 रुपये में बेच देती हैं. वर्तमान में वह हर साल 100 भेड़ें बेचकर लाखों कमा रही हैं और जल्द ही इस क्षमता को बढ़ाकर 200 करने वाली हैं. यह मॉडल साबित करता है कि कम समय में वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन को एक बड़े मुनाफे वाले बिजनेस में बदला जा सकता है.

'कंट्रोल्ड फीडिंग' से पूरा पोषण भेड़ों के मांस और वजन को बढ़ाने में लगता है

अरुणा देवी का 'सिंगल सेल' फॉर्मूला कर रहा है कमाल

पारंपरिक भेड़ पालन में एक बड़ी चुनौती मजदूरों की कमी है, क्योंकि कोई भी दिन भर धूप में भेड़ों के पीछे भागना नहीं चाहता है. अरुणा देवी के 'इंडोर फार्मिंग' मॉडल ने इस सिरदर्द को खत्म कर दिया है. यहां एक ही व्यक्ति आसानी से सैकड़ों भेड़ों की देखभाल कर सकता है, जिससे लेबर कॉस्ट लगभग शून्य हो जाती है. हालांकि शुरुआत में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में थोड़ा निवेश जरूर होता है, लेकिन इसका 'बेनेफिट-कॉस्ट रेशियो' 2.4 है, यानी निवेश के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा की कमाई. यह तकनीक विशेष रूप से उन शहरों से सटे इलाकों और सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए क्रांतिकारी है जहां जमीन कम है और घास की कमी रहती है. अरुणा देवी की सफलता ने यह साफ कर दिया है कि अगर युवा और शिक्षित महिलाएं अपनी डिग्री का उपयोग मिट्टी से जुड़कर करें, तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकती हैं बल्कि पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र को नई दिशा दे सकती हैं. उनकी यह 'पिंजरा पद्धति' आने वाले समय में भारतीय पशुपालन क्षेत्र का भविष्य बदलने वाली है. 

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