
आंध्र प्रदेश में झींगा पालन करने वाले किसानों की बढ़ती परेशानियों को देखते हुए मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने बड़ा कदम उठाया है. झींगा फ़ीड यानी चारे की लगातार बढ़ती कीमतों से परेशान किसानों को राहत दिलाने के लिए उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह को पत्र लिखकर मदद की मांग की है. दरअसल, सचिवालय में विशेष मुख्य सचिव बी. राजशेखर की अध्यक्षता में हुई एक अहम समीक्षा बैठक में जलीय कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा हुई. बैठक में यह फैसला लिया गया कि किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार से कुछ जरूरी मांगें की जाएं.
राज्य सरकार चाहती है कि मछली भोजन (फिश मील) के निर्यात को बढ़ावा दिया जाए और सोया आयात पर नियंत्रण लगाया जाए, ताकि झींगा फ़ीड की कीमतों को काबू में रखा जा सके. सरकार का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो जलीय कृषि से जुड़े किसानों की लागत और मुश्किलें दोनों बढ़ सकती हैं.
शनिवार देर रात जारी सरकारी बयान में बताया गया कि चंद्रबाबू नायडू ने केंद्रीय कृषि मंत्री को पत्र लिखकर झींगा फीड की लगातार बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि एक्वाकल्चर से जुड़े किसानों को राहत देने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं. अधिकारियों के मुताबिक, बैठक में इस बात पर विस्तार से चर्चा हुई कि फ़ीड की महंगी होती कीमतों का झींगा पालन करने वाले किसानों पर क्या असर पड़ रहा है. राज्य के कई किसान बढ़ती लागत की वजह से परेशान हैं.
इस दौरान मत्स्य पालन आयुक्त रामशंकर नायक ने राज्य में जलीय कृषि की मौजूदा स्थिति की पूरी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि झींगा उत्पादन कितना हो रहा है, किसानों द्वारा कितनी मात्रा में फ़ीड इस्तेमाल की जा रही है, फ़ीड की मौजूदा कीमतें क्या हैं और कंपनियां कितनी कीमत बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं. सरकारी बयान में कहा गया है कि सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रैकिश वॉटर एक्वाकल्चर (CIBA) के वैज्ञानिकों ने बताया कि जनवरी और मई 2026 के बीच सोया, मछली भोजन और मछली तेल जैसे प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है.
अधिकारियों ने बताया कि झींगा फीड बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं. इसकी वजह से फीड बनाने की लागत औसतन 31.03 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई है. इस बढ़ती लागत को कम करने के लिए उन्होंने दूसरे वैकल्पिक कच्चे माल के इस्तेमाल का सुझाव भी दिया. बैठक में मौजूद फ़ीड बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों ने बताया कि जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच फ़ीड में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. इसका सीधा असर झींगा पालन करने वाले किसानों की लागत पर पड़ रहा है.
अधिकारियों के मुताबिक, झींगा फ़ीड बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है. मछली भोजन (फिश मील) की कीमत 1.5 लाख रुपये प्रति टन से बढ़कर 2.4 लाख रुपये प्रति टन हो गई है. वहीं, मछली तेल की कीमत 2.8 लाख रुपये से बढ़कर 4.4 लाख रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है. इसके अलावा सोया लेसिथिन की कीमत भी 68 हजार रुपये से बढ़कर 1.1 लाख रुपये प्रति टन हो गई है. फ़ीड बनाने वाली कंपनियों ने बैठक में कहा कि कच्चे माल के महंगे होने से हर टन फ़ीड तैयार करने पर करीब 25 हजार रुपये का अतिरिक्त खर्च आ रहा है. इसी वजह से उन्होंने फ़ीड की कीमत में 25 से 31 रुपये प्रति किलो तक बढ़ोतरी की मांग की.
हालांकि, किसानों के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्तावित बढ़ोतरी का जोरदार विरोध किया है. उनका कहना है कि जब कच्चे माल की कीमतें घटती हैं, तब कंपनियां किसानों को उसका फायदा नहीं देतीं. किसानों ने आरोप लगाया कि फ़ीड बनाने वाली, प्रोसेसिंग करने वाली और एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियां एक ही बिजनेस ग्रुप की तरह काम कर रही हैं और इसका बोझ सीधे किसानों पर डाला जा रहा है.
बैठक में यह भी फैसला लिया गया कि पोल्ट्री फ़ीड की तरह अब झींगा फ़ीड की कीमतें भी हर महीने कच्चे माल की लागत के आधार पर तय की जाएंगी. वहीं, अधिकारियों ने सुझाव दिया कि झींगा खरीद की कीमतें हर 15 दिन में तय करने का सिस्टम भी शुरू किया जाए, ताकि किसानों को सही जानकारी मिल सके और वे सही समय पर अपनी मछली बेच सकें. किसानों ने सरकार से मांग की कि कम से कम अगले दो महीने तक, यानी गर्मियां पूरी होने तक, फ़ीड की मौजूदा कीमतें ही लागू रखी जाएं. इसके अलावा उन्होंने आंध्र प्रदेश स्टेट एक्वाकल्चर डेवलपमेंट अथॉरिटी (APSADA) से लाइसेंस प्राप्त एक्वाकल्चर फार्मों के लिए 1.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से सब्सिडी वाली बिजली देने की भी मांग की. (PTI)