
जरूरत के हिसाब से पशु अपनी खुराक कम खा रहा है. दूध उत्पादन भी पूरा नहीं कर रहा है. इतना ही नहीं जो दूध दे रहा है उसकी क्वालिटी भी गिर रही हो. दूध में फैट कम हो रही हो. यहां तक की खाई जा रही खुराक के चलते पशुओं का पेट भी खराब हो रहा हो, तो समझ जाइए की कहीं न कहीं पशु को दी जा रही खुराक में बदलाव की जरूरत है. हालांकि इन लक्षणों के चलते पशुपालक बहुत जल्दी परेशान हो उठते हैं. उन्हें लगता है कि उनकी गाय-भैंस किसी बीमारी की चपेट में आ रही है, जबकि ऐसा होता नहीं है. एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि ये सब लक्षण किसी बीमारी के कम और मौसम परिवर्तन के चलते होने वाले बदलावों के हैं.
ये वो वक्त होता है जब पशुओं की खुराक में बदलाव किया जाना चाहिए. लेकिन चारे और खुराक में बदलाव करते वक्त अगर आप पशुओं को मीठा सोडा खिला रहे हैं तो इसकी शुरुआत बहुत ही थोड़ी मात्रा से करें. क्योंकि खुराक में बदलाव करते वक्त मीठा सोडा खिलाना भी जरूरी होता है. वहीं पशुओं की दो से तीन ऐसी स्टेज भी होती हैं जब पशु को बहुत ही एहतियात के साथ मीठा सोडा खिलाना चाहिए या फिर मुमकिन हो तो खिलाना ही नहीं चाहिए.
दुधारू पशुओं के लिए मीठा सोडा बहुत ही उपयोगी माना जाता है. पशुपालन में इसका इस्तेमाल खासतौर पर पशु के पाचन को सुधारने और दूध की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किया जाता है.
लगातार मीठा सोडा न खिलाएं, जब पशु को ज्यादा दाना खिलाया जा रहा हो या पाचन की परेशानी हो.
पशुओं को साधारण नमक खिला रहे हैं तो सोडे की मात्रा का ध्यान रखें, जिससे शरीर में सोडियम का संतुलन न बिगड़े.
पशु गाभिन है या कोई दूसरी गंभीर बीमारी है तो डॉक्टरी सलाह पर ही मीठा सोडा खिलाएं.
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