पूसा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने IVF तकनीक से 4 साहीवाल बछिया का जन्म कराया, नस्‍ल सुधार में होगा फायदा

पूसा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने IVF तकनीक से 4 साहीवाल बछिया का जन्म कराया, नस्‍ल सुधार में होगा फायदा

पूसा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने IVF तकनीक से साहीवाल नस्ल की 4 बछियाओं का सफल जन्म कराया है. यह तकनीक देशी नस्लों के तेजी से सुधार और बेहतर दूध उत्पादन की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.

IVF Calves birth Pusa University BiharIVF Calves birth Pusa University Bihar
क‍िसान तक
  • Samastipur,
  • Mar 28, 2026,
  • Updated Mar 28, 2026, 4:17 PM IST

बिहार के समस्तीपुर में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने पहली बार IVF तकनीक के जरिए साहीवाल नस्ल की बछिया का सफल जन्म कराया है. यह उपलब्धि न सिर्फ पूर्वी भारत के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि देश में डेयरी सेक्टर की दिशा बदलने वाली मानी जा रही है. वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तकनीक के जरिए उच्च गुणवत्ता वाली देशी नस्लों को तेजी से बढ़ाया जा सकता है. खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में सामान्य गायों को सरोगेट मदर के रूप में इस्तेमाल कर बेहतर नस्ल के बछड़े-बछिया पैदा किए जा सकते हैं. इससे पशुपालकों को कम समय में ज्यादा उत्पादक पशु मिल सकेंगे.

विश्वविद्यालय की टीम ने IVF तकनीक के माध्यम से कुल चार बछियाओं का जन्म कराया है. इनमें से तीन का जन्म पिपराकोठी स्थित देशी नस्ल संवर्धन केंद्र में हुआ, जबकि एक बछिया का जन्म मोतिहारी के चकिया गौशाला में हुआ है. इस सफलता को वैज्ञानिक देशी नस्लों के विकास की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं.

कुलपति बोले- देशी नस्‍लों की गायें जलवायु के अनुकूल

कुलपति डॉ. पी.एस. पांडेय ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विदेशी नस्लों जैसे होलस्टीन फ्रीजियन और जर्सी गायों में बीमारियों और प्रजनन संबंधी समस्याएं बढ़ी हैं. वहीं, देशी नस्लें भारतीय जलवायु के अनुसार ज्यादा अनुकूल हैं और अब उनमें भी उच्च दूध उत्पादन की क्षमता विकसित की जा रही है.

'क्लाइमेट-स्मार्ट' गाय विकसित करने पर फोकस

उन्होंने बताया कि OPU-IVF तकनीक के जरिए “क्लाइमेट-स्मार्ट” गाय विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है. ऐसी गायें न केवल अधिक गर्मी सहन कर सकेंगी, बल्कि कम बीमार पड़ेंगी और किसानों के लिए ज्यादा लाभदायक साबित होंगी.

देशी गाय का दूध पाचन के लिहाज से अच्‍छा

डेयरी वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि देशी नस्लों से मिलने वाला A2 दूध पोषण और स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर होता है. यह दूध पाचन में आसान होता है और इसमें ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए लाभकारी माने जाते हैं. वहीं, विदेशी नस्लों का A1 दूध कुछ मामलों में पाचन से जुड़ी समस्याएं बढ़ा सकता है.

सरोगेट मां किसी भी नस्ल की हो सकती है: वैज्ञानिक

इस परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि IVF तकनीक के जरिए एक ही पीढ़ी में शुद्ध साहीवाल नस्ल तैयार की जा सकती है, भले ही सरोगेट मां किसी भी नस्ल की हो. इससे नस्ल सुधार की प्रक्रिया काफी तेज हो जाएगी और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी. अब विश्वविद्यालय इस तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की योजना बना रहा है. उम्मीद है कि आने वाले समय में यह पहल बिहार समेत पूरे देश में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में नई क्रांति ला सकती है. (जहांगीर आलम की रिपोर्ट)

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