पहाड़ों में पहले से कम हो रही है बर्फबारीपहाड़ों में इस बार बर्फबारी और बारिश कम होने से पर्यावरणविद और वैज्ञानिक चिंतित हैं. पर्यावरणविदों की मानें तो हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी कम होने से एवलांच (भू-स्खलन या धरती का धंसना) की घटनाएं बढ़ जाती हैं. यहां तक कि बारिश कम होने से प्राकृतिक जल स्त्रोत सूख जाएंगे. मौसम चक्र का गहरा प्रभाव ग्लेशियरों और वनस्पतियों पर पड़ रहा है, जबकि जंगलों में लगने वाली आग पर रोकथाम करना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में माना जा रहा है कि हिमालय से खतरे के संकेत मिल रहे हैं. इन क्षेत्रों की खेती-बाड़ी भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रही है.
हिमालयी क्षेत्रों में उम्मीद के हिसाब से बर्फबारी नहीं हो रही है और न ही निचले क्षेत्रों में मौसम के अनुकूल बारिश हो रही है. यह भविष्य के लिए किसी अशुभ संकेत से कम नहीं है. बीते वर्षों की बात करें तो बसंत पंचमी के बाद काश्तकारों की फसलों में तेजी से वृद्धि होने लगती थी. मगर इस बार मौसम के लगातार परिवर्तन होने से पर्यावरणविद और वैज्ञानिक खासे चिंतित हैं. इनके साथ ही काश्तकारों के माथे पर भी चिंता की लकीरें दिख रही हैं. केदारघाटी में लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन से जल स्रोतों के जल स्तर में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है. ऐसे में पेयजल संकट गहराने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता.
केदारनाथ धाम में इस बार शीतकाल में सबसे कम बर्फबारी हुई है, जो प्रकृति, पर्यावरण के लिए शुभ नहीं है. बीते वर्ष अक्टूबर से अभी तक धाम में एक समय पर अधिकतम तीन फीट बर्फ ही गिर पाई है. जबकि पूरे सीजन में धाम में छह फीट तक बर्फ जमा रही, जिसमें चार फीट तक बर्फ ही मौजूद है. अगर आने वाले दिनों में और बर्फबारी नहीं हुई तो यह जमा बर्फ एक सप्ताह में ही तेज धूप से पिघल जाएगी. इन हालातों में मार्च से ही यहां पहाड़ तपने शुरू हो जाएंगे और चोराबाड़ी सहित अन्य ग्लेशियर भी पिघलने लगेंगे.
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समुद्रतल से 11750 फीट की ऊंचाई पर मेरू और सुमेरू पर्वत शृंखलाओं की तलहटी पर विराजमान केदारनाथ की पहाड़ियों को इस बार बर्फ की पर्याप्त खुराक नहीं मिल पाई है. बीते वर्ष पूरे यात्राकाल में मई, सितंबर और अक्टूबर माह में धाम में बर्फबारी हुई थी. इसके बाद यहां 17 नवंबर से दिसंबर आखिर तक बर्फबारी नहीं हुई. इस वर्ष जनवरी के शुरुआती 15 दिन केदारनाथ में कुल पांच फीट बर्फबारी हुई है. इसके बाद 30 जनवरी को धाम में बर्फबारी हुई, मगर उसके बाद से यहां तेज बर्फ नहीं गिरी है.
हिमालय रेंज में लगभग दस हजार छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं, जिन पर मौसम चक्र में बदलाव का सीधा असर पड़ रहा है. दिसंबर के माह में ग्लेशियरों में बर्फ की मोटी परत जमना जरूरी है क्योंकि जनवरी-फरवरी में ऊपरी क्षेत्रों में होने वाली बर्फबारी ग्लेशियरों को आकार देने में सक्षम नहीं होती और इस बार तो बर्फबारी ना के बराकर हुई है. केदारनाथ से चार किमी ऊपर चोराबाड़ी ताल है, जहां से मंदाकिनी नदी निकलती है. इस ग्लेशियर का क्षेत्रफल लगभग 14 किमी है जबकि इसी ग्लेशियर से लगा कंपेनियन ग्लेशियर है, जो सात किमी क्षेत्र में है. बीते वर्ष सितंबर-अक्टूबर में इन्हीं दोनों ग्लेशियरों में हिमखंड टूटने की तीन घटनाएं हुई थीं.
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प्रसिद्ध पर्यावरणविद देव राघवेंद्र बद्री ने बताया कि मौसम का चक्र शिफ्ट हो गया है. बारिश और बर्फबारी सही से नहीं हो रही है. इसका असर ग्लेशियर पर पड़ेगा और ग्लेशियर में बर्फ नहीं होगी तो वे जल्दी पिघल जाएंगे. उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं होने से पर्यावरण का खतरा सामने आ रहा है. इससे वैज्ञानिकों के साथ ही जो इस क्षेत्र में काम कर रहे बड़े-बड़े संगठन हैं, वे भी खासे चिंतित हैं।. ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम में तेजी से परिवर्तन दिख रहा है. इसका गहरा प्रभारी हमारी ऋतुओं पर पड़ रहा है.
इस मौसमी बदलाव का असर वनस्पतियों पर भी देखने को मिल रहा है. पर्यावरणविद देव राघवेंद्र बद्री ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र तुंगनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ और मदमहेश्वर धाम की बात करें तो यहां उम्मीद के अनुसार भी बर्फ नहीं गिरी है. हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ नहीं गिरेगी तो जो नई बर्फ होगी वो जल्दी से फिसल जाएगी और एवलांच की घटनाएं बढ़ती जाएंगी. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का गलत असर बड़ी नदियों के साथ ही पानी के स्त्रोतों पर भी देखने को मिलेगा.(रिपोर्ट/प्रवीण सेमवाल)
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