बिहार में बंद पड़ी चीनी मिलेंदेश में गन्ने की खेती का जिक्र होते ही कुछ राज्यों का नाम अपने-आप जुबान पर आ जाता है. उत्तर प्रदेश अपनी उपजाऊ जमीन के लिए जाना जाता है, महाराष्ट्र अपने मजबूत सहकारी मॉडल के लिए और कर्नाटक-तमिलनाडु अपने बेहतर उत्पादन के लिए. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी इसी सूची में बिहार का नाम भी पूरे सम्मान के साथ लिया जाता था. आज स्थिति यह है कि बिहार गन्ना और चीनी उत्पादन के नक्शे से लगभग गायब हो चुका है.
विशेषज्ञों के अनुसार, जिस सहकारी व्यवस्था को आज महाराष्ट्र मॉडल के रूप में देखा जाता है, उसकी नींव दशकों पहले बिहार में रखी गई थी. बीसवीं सदी की शुरुआत में बिहार में चीनी मिलें केवल उद्योग नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी थीं. हवा में गन्ने के रस की खुशबू और गांवों में नकद आय की रौनक थी. लेकिन यह सुनहरा दौर ज्यादा दिन नहीं टिक सका.
चीनी उद्योग के पतन का सबसे बड़ा कारण माना जाता है बिहार स्टेट शुगर कॉरपोरेशन का फेल होना. 1970 के दशक में जब देश में चीनी मिलों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, तब बिहार में भी निजी मिलों को सरकार ने अपने नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया. 1974 में मिलों को संभालने के लिए बिहार स्टेट शुगर कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाया गया, लेकिन यह कॉरपोरेशन खुद ही सिस्टम की कमजोरी का शिकार बन गया.
1977 से 1985 के बीच राज्य सरकार ने 15 चीनी मिलों का अधिग्रहण किया, मगर न तो प्रबंधन सुधरा और न ही उत्पादन. धीरे-धीरे मिलें घाटे में जाती गईं और आखिरकार बंद होती चली गईं.
विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी चीनी मिल के लिए लगातार बिजली, अच्छी सड़कें और मजबूत सिंचाई व्यवस्था जीवनरेखा होती है. बिहार में यही तीनों सुविधाएं सबसे बड़ी कमजोरी बन गईं.
1904 में बिहार की पहली चीनी मिल लगी थी. महज तीन दशकों में यह संख्या बढ़कर 33 हो गई. एक समय बिहार देश के कुल चीनी उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन करता था. आज हालात यह हैं कि देश के 150 लाख टन से अधिक चीनी उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी 4 प्रतिशत से भी कम रह गई है.
बिजली की अनियमित आपूर्ति, गन्ना ढुलाई के लिए खराब सड़कें और सिंचाई व्यवस्था के चौपट होने से गन्ने की खेती प्रभावित हुई. जब खेतों में गन्ना नहीं होगा, तो मिलें कैसे चलेंगी, यह समझना मुश्किल नहीं है.
समस्तीपुर, गोपालगंज और चंपारण जिले कभी चीनी उत्पादन के सबसे बड़े केंद्र माने जाते थे. गंगा और उसकी सहायक नदियां इन इलाकों को प्राकृतिक रूप से समृद्ध बनाती थीं. समस्तीपुर, जो गंगा और बूढ़ी गंडक के किनारे बसा है, वहां कभी सिंचाई की कोई समस्या नहीं थी. मिलें दिन-रात चलती थीं और किसानों को गन्ने की बिक्री से सीधी नकद आमदनी होती थी.
लेकिन समय के साथ जलभराव, सिंचाई प्रबंधन की नाकामी और सरकारी उदासीनता ने गन्ना खेती की कमर तोड़ दी. इसका सीधा असर चीनी मिलों पर पड़ा.
मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं, 1960 के दशक के अंत में निजी मिल मालिकों और सरकार के बीच तनाव बढ़ने लगा. सरकार की बढ़ती दखलअंदाजी से मालिक नाखुश थे. 1972 में केंद्र सरकार ने एक शुगर मॉनिटरिंग कमेटी बनाई, जिसने मिलों को सरकारी नियंत्रण में लेने की सिफारिश की. यही फैसला बिहार में चीनी उद्योग के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ-लेकिन नकारात्मक दिशा में.
मिलें बंद हुईं तो सिर्फ उत्पादन ही नहीं रुका, बल्कि भ्रष्टाचार के नए रास्ते खुले. कहा जाता है कि बंद मिलों की मशीनरी और संपत्ति औने-पौने दाम पर बेच दी गई. कबाड़ के सौदों में कुछ लोग ‘राजा’ बन गए, जबकि किसान और मजदूर बेरोजगारी और पलायन के दलदल में फंसते चले गए.
एक्सपर्ट मानते हैं कि बिहार में आज भी चीनी उत्पादन की अपार संभावना है. राज्य सरकार ने ऐसे कृषि-जलवायु क्षेत्र चिन्हित कर लिए हैं जो गन्ने की खेती के लिए सुटेबल हैं. जरूरत है नए निवेशकों, मजबूत सहकारी ढांचे और बुनियादी ढांचे में सुधार की. अगर सब कुछ सही दिशा में चला, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार की बंद पड़ी चीनी मिलों से फिर सायरन बजेगा, हवा में गन्ने के रस की खुशबू फैलेगी और मिठास एक बार फिर लोगों की जिंदगी में लौटेगी.
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