Monsoon Update: 100 साल से ज्यादा समय का सबसे सूखा जून! खरीफ सीजन पर बढ़ा संकट, जुलाई पर टिकी किसानों की उम्मीद

Monsoon Update: 100 साल से ज्यादा समय का सबसे सूखा जून! खरीफ सीजन पर बढ़ा संकट, जुलाई पर टिकी किसानों की उम्मीद

देश में जून 2026 में सामान्य से करीब 32 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जिसे एक सदी से ज्यादा समय का सबसे सूखा जून बताया जा रहा है. सभी प्रमुख खरीफ राज्यों में बारिश की कमी दिखी है. अल नीनो के असर और कमजोर मॉनसून के बीच अब किसानों और कृषि क्षेत्र की नजर जुलाई की बारिश पर टिकी है.

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100 साल से ज्यादा समय का सबसे सूखा जून! खरीफ सीजन पर बढ़ा संकट, जुलाई पर टिकी किसानों की उम्मीदअल नीनो संकट (AI Image)

देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत इस बार कमजोर रही है और जून में बारिश की भारी कमी ने खरीफ सीजन को लेकर चिंता बढ़ा दी है. 24 जून 2026 तक भारत में सामान्य से करीब 32 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. शुरुआती जून का बारिश घाटा इतना गहरा रहा कि कई मौसम विश्लेषकों ने इसे एक सदी से ज्यादा समय का सबसे सूखा जून बताया है. साल 2025 की तुलना में इस बार तस्वीर पूरी तरह उलट दिखाई दे रही है. पिछले साल मॉनसून जल्दी और तेज गति से आगे बढ़ा था, जिससे खरीफ बुवाई समय से पहले शुरू हो गई थी. वहीं, इस साल मानसून 4 जून को केरल पहुंचा, जबकि इसकी सामान्य तिथि 1 जून मानी जाती है और यह मौसम विभाग के मई में जारी अनुमान से भी देर से पहुंचा. इसके बाद मानसून की प्रगति धीमी और कमजोर बनी रही.

सभी प्रमुख खरीफ राज्यों में सामान्य से कम बारिश

24 जून तक देश के सभी नौ प्रमुख खरीफ राज्यों में जून के दीर्घकालिक औसत से कम बारिश दर्ज हुई. भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, खेती वाले बड़े हिस्से में बारिश की कमी दर्ज की गई है. मौसम विभाग के मानकों के अनुसार, अगर बारिश सामान्य से 19 प्रतिशत तक ऊपर या नीचे रहती है तो उसे सामान्य माना जाता है, जबकि 20 प्रतिशत या उससे अधिक कमी को ‘डिफिशिएंट’ यानी कमी वाली स्थिति माना जाता है.

खेती के लिए जून क्यों है सबसे अहम महीना?

भारत में आज भी लगभग आधी खेती मानसून की बारिश पर निर्भर है. जून में समय पर और पर्याप्त बारिश खरीफ सीजन की दिशा तय करती है. इसी दौरान धान, दलहन, तिलहन और कपास जैसी फसलों की बुवाई तेज होती है. कमजोर और सूखी शुरुआत की वजह से कई इलाकों में बुवाई प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है. बारिश की कमी शुरुआती फसल वृद्धि को कमजोर कर सकती है और किसानों को जुलाई में अच्छी बारिश का इंतजार करना पड़ सकता है, ताकि शुरुआती घाटे की भरपाई हो सके.

आंकड़ों में दिखी बारिश की बड़ी कमी

4 जून से 22 जून के बीच मॉनसून सामान्य से 46 प्रतिशत नीचे रहा और इसे हाल के इतिहास के सबसे सूखे जून चरणों में माना जा रहा है. राज्यवार स्थिति देखें तो मध्य प्रदेश में 58 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज हुई. महाराष्ट्र में स्थिति और गंभीर रही जहां सामान्य से 85 प्रतिशत कम बारिश हुई. गुजरात में भी 84 प्रतिशत बारिश घाटा दर्ज किया गया.

महाराष्ट्र के भीतर भी हालात चुनौतीपूर्ण रहे. कोंकण और गोवा क्षेत्र में 61 प्रतिशत, मध्य महाराष्ट्र में 68 प्रतिशत और मराठवाड़ा में 64 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज हुई. यह वे क्षेत्र हैं, जहां शुरुआती खरीफ बुवाई में सोयाबीन, कपास और मोटे अनाज की खेती बड़े पैमाने पर होती है.

पूर्व और दक्षिण भारत भी रहे पीछे

पूर्व और पूर्वोत्तर भारत भी कमजोर मानसून से अछूते नहीं रहे. ओडिशा में 47 प्रतिशत और असम-मेघालय क्षेत्र में 48 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. इससे धान आधारित खेती वाले राज्यों में चिंता बढ़ी है और अब किसानों की नजर जुलाई की बारिश पर है.

दक्षिण भारत में तेलंगाना में 32 प्रतिशत, केरल में 31 प्रतिशत और तटीय कर्नाटक में 47 प्रतिशत कम बारिश हुई. हालांकि, रायलसीमा क्षेत्र इस दौरान अपवाद रहा और यहां सामान्य से 14 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई.

कम बारिश के बीच बुवाई के आंकड़ों ने दी राहत

बारिश कमजोर रहने के बावजूद खरीफ बुवाई के शुरुआती आंकड़ों ने कुछ राहत दी है. 19 जून तक देश में कुल खरीफ बुवाई क्षेत्र 119.9 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल इसी समय यह 117.95 लाख हेक्टेयर था.

धान की बुवाई सबसे आगे रही. इस साल 12.36 लाख हेक्टेयर में धान लगाया गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 8.09 लाख हेक्टेयर था. विशेषज्ञ मानते हैं कि सिंचित इलाकों में किसानों ने बारिश का इंतजार किए बिना बुवाई जारी रखी.

कुछ इलाकों में राहत भी दिखी

हालांकि, देशभर की तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं रही. पश्चिम राजस्थान में 8 प्रतिशत और पूर्वी राजस्थान में 29 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई. वहीं, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सामान्य से 42 प्रतिशत अधिक वर्षा रिकॉर्ड की गई. लेकिन इन क्षेत्रों को छोड़ दें तो देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून की शुरुआत कमजोर रही.

अल नीनो ने बढ़ाई मौसम की चुनौती

कमजोर मॉनसून के पीछे तेजी से विकसित हो रही अल नीनो स्थिति को बड़ा कारण माना जा रहा है. 22 जून तक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का नीनो 3.4 इंडेक्स करीब +1.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य +0.5 डिग्री की सीमा से काफी ऊपर है.

भारत मौसम विज्ञान विभाग का अनुमान है कि मानसून के दौरान अल नीनो और मजबूत हो सकता है. मौसम विभाग ने पूरे सीजन के लिए दीर्घकालिक औसत के करीब 90 प्रतिशत बारिश का अनुमान दिया है और इसके पीछे अल नीनो को प्रमुख वजह माना गया है.

अमेरिका की मौसम एजेंसी NOAA ने भी मई से जुलाई के बीच अल नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक बताई है. आमतौर पर अल नीनो वाले वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश देखी जाती है.

जुलाई तय करेगी खरीफ की असली तस्वीर

विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर जून पूरे मॉनसून का अंतिम नतीजा तय नहीं करता. जलवायु परिवर्तन की वजह से अब बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है और कम दिनों में ज्यादा तेज बारिश देखने को मिल रही है.

हालांकि, जून की यह कमजोर शुरुआत खरीफ सीजन के लिए चुनौती जरूर बढ़ाती है. अब किसानों और कृषि बाजारों की नजर जुलाई की बारिश पर है, क्योंकि आने वाले कुछ सप्ताह ही तय करेंगे कि खरीफ सीजन संभलता है या दबाव और बढ़ता है.

नोट: ऊपर दिए गए आंकड़े भारत मौसम विज्ञान विभाग के 1971–2020 औसत पर आधारित ग्रिडेड वर्षा और स्टेशन आधारित वर्षा विश्लेषण से लिए गए हैं. 24 जून तक के आंकड़े अस्थायी हैं और महीने के अंत तक इनमें बदलाव संभव है. (दीपू राय की रिपोर्ट)

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