सैलाब और सूखे के बीच फंसी खरीफ की खेती भारत में खेती पूरी तरह मॉनसून पर टिकी है.अल नीनो की खौफ के बीच बारिश की हर बूंद किसानों के लिए अमृत जैसी है. जब आसमान में काले बादल छाते हैं, तो किसान के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. इस साल भी किसानों ने आसमान की तरफ उम्मीद से देखा. बारिश ने कुछ हद तक राहत दी है, लेकिन पूरे देश में बारिश का हाल एक जैसा नहीं है. मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार,1 जून 2026 से 9 अगस्त 2026 तक पूरे देश में औसतन 466.5 मिलीमीटर बारिश हुई है. पुराने सालों के हिसाब से यह आंकड़ा 526.9 मिलीमीटर होना चाहिए था. मतलब इस साल देश में बारिश में 11 तिशत की कमी देखी गई है. हालांकि, मौसम विभाग इसे सामान्य बारिश मान रहा है, लेकिन इस कमी ने किसानों के दिलों में डर पैदा कर दिया है. यह मानसूनी सीजन कुछ इलाकों के लिए वरदान साबित हुआ है, जबकि कुछ के लिए मुश्किल इंतज़ार बन गया है.
बारिश के बंटवारे को राज्यों के हिसाब से देखें, तो कहानी अजीब लगती है. बादलों ने अपनी मर्जी से कहीं बहुत ज्यादा पानी बरसाया है और कहीं बिल्कुल भी नहीं. कुछ राज्यों में इतनी बारिश हुई कि नदियां उफान पर आ गईं, और कुछ इलाके पानी की बूंद के लिए तरसते रहे. उदाहरण के लिए, दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव में सामान्य से 69 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई. लद्दाख जैसे ठंडे इलाके में तो कुदरत का चमत्कार देखने को मिला. वहां 176 प्रतिशत ज्यादा पानी बरसा है, जो बहुत बड़ा रिकॉर्ड है. देश की राजधानी दिल्ली में 27 प्रतिशत और ओडिशा में 28 प्रतिशत ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई.
लेकिन दूसरी तरफ, कुछ राज्यों से बादलों ने जैसे दुश्मनी निकाल ली. अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से 37 प्रतिशत कम, मेघालय में 56 प्रतिशत कम, और बिहार में 36 प्रतिशत कम बारिश हुई है. खेती के लिए अहम राज्य पंजाब में भी 35 प्रतिशत कम बारिश हुई है. आंध्र प्रदेश में भी बादलों ने कंजूसी दिखाई है और वहां 33 प्रतिशत कम बारिश हुई. बारिश का यह भारी असंतुलन किसानों के लिए परेशानी बन गया है.
पूरे जून के महीने में किसानों को भारी निराशा का सामना करना पड़ा. शुरुआती हफ्तों में खेतों की सूखती मिट्टी देखकर लग रहा था मानो भयानक सूखा पड़ेगा. जून में छत्तीसगढ़ जैसे खेती वाले राज्य में बारिश बहुत कम हुई. वहां बारिश का आंकड़ा गिरकर 64 से 65 प्रतिशत तक कम हो गया. पूर्वी मध्य प्रदेश में भी 61 से 68 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज की गई. गुजरात और विदर्भ में तो हालात ज्यादा खराब थे. वहां हफ्तों तक 79 से लेकर 100 प्रतिशत तक का भारी सूखा देखने को मिला. कुदरत का मिजाज बदलते देर नहीं लगती. जुलाई के महीने ने किसानों के मन में नई उम्मीद जगा दी. 15 जुलाई आते-आते हवाओं ने अपना रास्ता बदल लिया और मौसम सुहाना हो गया. जो बादल जून में रूठे हुए थे, उन्होंने जुलाई के बीच से कई राज्यों में झूम कर बरसना शुरू कर दिया.
देश 15 जुलाई के बाद वाले हफ्तों को ध्यान से देखें, तो कुछ राज्यों में बादलों ने खजाना खाली कर दिया. खासकर 22 जुलाई, 29 जुलाई और 5 अगस्त वाले हफ्तों में अच्छा बदलाव आया. छत्तीसगढ़ में 22 जुलाई वाले हफ्ते में 33 प्रतिशत, 29 जुलाई को 16 प्रतिशत और 5 अगस्त वाले हफ्ते में 26 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई. मध्य महाराष्ट्र में तो अगस्त के पहले हफ्ते में ही 140 प्रतिशत तक ज्यादा बारिश हो गई. ओडिशा में 15 जुलाई वाले हफ्ते में 68 प्रतिशत, 22 जुलाई को 129 प्रतिशत और 29 जुलाई को 35 प्रतिशत ज्यादा पानी बरसा. पश्चिमी मध्य प्रदेश और विदर्भ में भी अच्छी बारिश हुई. लेकिन बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी इलाकों में बारिश कम रही, जिससे वहां के किसान उदास होकर देख रहे हैं.
बारिश के इस मिजाज का सीधा असर खेती और खरीफ फसल की बुवाई पर पड़ा है. जमीन में नमी होगी, तभी बीज अच्छे से पनपेगा और फसल लहलहा कर बड़ी होगी! कृषि विभाग की रिपोर्ट को आसान भाषा में समझें, तो 31 जुलाई 2026 तक पूरे देश में कुल खरीफ फसल 894.22 लाख हेक्टेयर में बोई जा चुकी है. अगर हम इस ताज़ा आंकड़े को पिछले साल 2025 के इसी समय से मिलाएं, तो स्थिति चिंताजनक है. पिछले साल इसी समय तक 920.72 लाख हेक्टेयर जमीन में बीज बोने का काम पूरा हो चुका था. मतलब इस साल 26.50 लाख हेक्टेयर जमीन में कम बुवाई हुई है.
यह कमी छोटी नहीं है. इसका सीधा असर अनाज की पैदावार और जनता के खाने की सुरक्षा पर पड़ेगा. जिन राज्यों में बारिश बहुत कम हुई है या अभी भी सूखा चल रहा है, वहां के किसान खेतों की तैयारी और बीज बोने के काम में काफी पीछे रह गए हैं. खेती के कामों में देरी हो गई है और फसल की पैदावार को लेकर सभी की चिंताएं बढ़ गई हैं.
अब अलग-अलग फसलों की बात करते हैं कि कहां बुवाई ने जोर पकड़ा और कहां किसानों को निराशा मिली है. सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, देश की सबसे खास फसल यानी धान की बुवाई इस साल 301.49 लाख हेक्टेयर जमीन में हुई है. पिछले साल इसी समय तक धान 308.39 लाख हेक्टेयर में बोया जा चुका था. यानी धान की बुवाई में 6.89 लाख हेक्टेयर की साफ कमी देखी गई है. दालों की बात करें तो इस साल 95.18 लाख हेक्टेयर में दालें बोई गई हैं, जो पिछले साल के 101.60 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 6.41 लाख हेक्टेयर कम है.
मोटे अनाज का इलाका भी 170.60 लाख हेक्टेयर से गिरकर 157.77 लाख हेक्टेयर रह गया है. इन सभी कमियों और उदासी के बीच, सिर्फ तिलहन ने ही उम्मीद की किरण दिखाई है. तिलहन की बुवाई इस साल 172.32 लाख हेक्टेयर इलाके में हुई है, जो पिछले साल के 171.13 लाख हेक्टेयर से 1.19 लाख हेक्टेयर ज्यादा है. कुल मिलाकर यह खरीफ का सीजन हमारे किसानों के लिए बहुत बड़े और कड़े इम्तिहान की तरह गुजर रहा है.
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