गॉडज़िला अल नीनो (AI- तस्वीर)जून का महीना आते ही पूरे भारत को जिस आवाज का सबसे ज्यादा इंतजार रहता है, वह है बारिश की पहली बूंदों की. टिन की छतों पर पड़ती बारिश की आवाज, खेतों में उठती मिट्टी की खुशबू और किसानों के चेहरों पर लौटती उम्मीदें, यही भारतीय मॉनसून की पहचान है. इस साल भी दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने केरल के तट पर दस्तक दे दी है और धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन इस बार मॉनसून की खुशियों के साथ एक बड़ी चिंता भी जुड़ गई है वो है 'गॉडज़िला अल नीनो' की.
दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल नीनो पिछले कई दशकों का सबसे शक्तिशाली अल नीनो साबित हो सकता है. इसकी संभावित ताकत को देखते हुए इसे 'गॉडज़िला अल नीनो' का नाम दिया गया है. हालांकि अभी तक किसी अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसी ने इसे आधिकारिक रूप से पूर्ण विकसित अल नीनो घोषित नहीं किया है, लेकिन इसके संकेत लगातार मजबूत होते जा रहे हैं.
वैज्ञानिक जिस 'नीनो 3.4' क्षेत्र पर सबसे ज्यादा नजर रखते हैं, वहां समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 0.9 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है. यह अल नीनो की पहचान मानी जाने वाली 0.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से काफी ऊपर है. यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स का अनुमान है कि दिसंबर तक यह बढ़कर 3 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक हो सकता है. यदि ऐसा हुआ तो यह 1997-98 और 2015-16 के रिकॉर्ड तोड़ सकता है,
भारत के लिए अल नीनो हमेशा चिंता का विषय रहा है क्योंकि इसका सीधा असर मॉनसून और किसानों पर पड़ता है. जब प्रशांत महासागर गर्म होता है तो बारिश पैदा करने वाली वायुमंडलीय गतिविधियां भारत से दूर खिसक जाती हैं. इससे मॉनसून कमजोर पड़ सकता है और बारिश सामान्य से कम हो सकती है. वहीं, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी इस बार सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है. IMD के अनुसार, इस साल मॉनसून की बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है. साथ ही, बारिश सामान्य से कम रहने की आशंका भी अधिक बताई गई है.
यह स्थिति किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की लगभग 60 प्रतिशत खेती आज भी बारिश पर निर्भर है. देश की आधे से अधिक कृषि भूमि पर सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. ऐसे में यदि मॉनसून कमजोर रहता है तो इसका सीधा असर खरीफ सीजन और इसमें उगाई जाने वाली फसलों की पैदावार, किसानों की आय और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है.
फिलहाल मॉनसून अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है और कई राज्यों में बारिश शुरू हो चुकी है. लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की नजर अब प्रशांत महासागर पर टिकी हुई है. आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि अल नीनो कितना मजबूत बनता है और भारत के मॉनसून पर उसका कितना प्रभाव पड़ता है. फिलहाल देश में बारिश की उम्मीद और अल नीनो की चिंता, दोनों साथ-साथ चल रही हैं. (Indiatoday.in)
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