लंदन की नौकरी छोड़ी, जिस पराली को सब जला रहे थे उसी से खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

लंदन की नौकरी छोड़ी, जिस पराली को सब जला रहे थे उसी से खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

लंदन की नौकरी छोड़कर भारत लौटे केमिकल इंजीनियर शुभम सिंह ने खेतों की पराली को अपना बिजनेस मॉडल बना लिया. मुरैना के क्रास्ट स्टार्टअप में पराली से पेपर, पैकेजिंग और ग्रीन बोर्ड तैयार किए जा रहे हैं. इससे किसानों को पराली से कमाई का मौका मिल रहा है.

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लंदन की नौकरी छोड़ी, जिस पराली को सब जला रहे थे उसी से खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

जिस पराली को किसान अक्सर बोझ समझकर जला देते हैं, वही अब चंबल के मुरैना में युवाओं के लिए कमाई का कच्चा माल बन गई है. खेतों से निकलने वाला यह कृषि अपशिष्ट, जो कभी धुएं और प्रदूषण की वजह बनता था, अब पेड़ और प्लास्टिक का विकल्प तैयार कर रहा है.यानी जिसे कल तक कचरा समझा जाता था, वही आज कारोबार और इनोवेशन की नींव बन रहा है.

मुरैना के युवाओं ने पराली को सिर्फ जलने से रोकने का नहीं, बल्कि उसे कीमती उत्पाद में बदलने का मॉडल तैयार किया है. धान की पराली से पेपर और पैकेजिंग मटेरियल से लेकर इंजीनियर्ड ग्रीन बोर्ड तक बनाए जा रहे हैं.इस पहल की अगुवाई कर रहे हैं CRASTE स्टार्टअप के शुभम सिंह, जिन्होंने धान के साथ गेहूं, सरसों और गन्ने के कृषि अपशिष्ट को भी उपयोगी उत्पादों में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है.

 लंदन में आया आइडिया, देश की मिट्टी ने वापस बुलाया

शुभम सिंह पेशे से केमिकल इंजीनियर हैं.उन्होंने लंदन से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और वहां नौकरी भी की. लेकिन विदेश में रहते हुए भी उनका मन देश और यहां की समस्याओं से जुड़ा रहा.

शुभम बताते हैं कि लंदन की लाइब्रेरी में पढ़ाई के दौरान एक दिन उन्होंने यूके के एक अखबार में दिल्ली के वायु प्रदूषण से जुड़ी खबर पढ़ी.भारत की राजधानी के प्रदूषण को लेकर प्रकाशित इस खबर ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर ऐसा क्या किया जाए जिससे प्रदूषण की इस समस्या का कोई व्यावहारिक समाधान निकले.

यहीं से उन्होंने पराली को समस्या के बजाय कच्चे माल के रूप में देखने की शुरुआत की.उन्होंने रिसर्च की और अपनी केमिकल इंजीनियरिंग की समझ का इस्तेमाल करते हुए ऐसा मॉडल तैयार करने पर काम शुरू किया, जिसमें खेतों में जलने वाली पराली को उपयोगी उत्पादों में बदला जा सके.इसी सोच ने आगे चलकर क्रास्ट स्टार्टअप का रूप लिया.

जिस पराली को किसान जलाते थे, वही बनी कच्चा माल

धान की कटाई के बाद खेत में बड़ी मात्रा में पराली बचती है. कई इलाकों में किसान इसे जल्दी साफ करने के लिए जला देते हैं। इससे धुएं और प्रदूषण की समस्या बढ़ती है.

क्रास्ट ने इसी समस्या को अवसर में बदलने की कोशिश की. कंपनी किसानों से कृषि अपशिष्ट लेकर उसका इस्तेमाल अपने उत्पाद तैयार करने में करती है.यानी जिस अवशेष को पहले किसान के लिए परेशानी माना जाता था, वही अब वैल्यू एडेड प्रोडक्ट बनाने का बेस मटेरियल बन रहा है.इस मॉडल से एक तरफ पराली जलाने की जरूरत कम होती है, वहीं किसानों को अपने खेत के अवशेष से अतिरिक्त आमदनी का रास्ता मिलता है.

पराली से पेपर और पैकेजिंग तक

क्रास्ट के उत्पादों को मोटे तौर पर दो कैटेगरी में देखा जा सकता है.पहली कैटेगरी में पराली से तैयार पेपर और पैकेजिंग प्रोडक्ट्स शामिल हैं. पराली से पल्प तैयार कर उससे पेपर, पेपर बैग, कोस्टर, कार्ड्स और कई तरह के टेबलवेयर व पैकेजिंग आइटम बनाए जा रहे हैं.यानी जिस कृषि अवशेष को बेकार समझकर खेत में जला दिया जाता था, वह अब बाजार में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद का हिस्सा बन रहा है.

पराली से बन रहा ग्रीन बोर्ड, फर्नीचर में भी इस्तेमाल

क्रास्ट का दूसरा प्रमुख इनोवेशन इंजीनियर्ड ग्रीन बोर्ड है.इन बोर्ड्स का इस्तेमाल फर्नीचर और कुछ कंस्ट्रक्शन एप्लीकेशन में किया जा सकता है.

कंपनी का दावा है कि उसके बोर्ड पारंपरिक प्लाईवुड की तुलना में पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में तैयार किए गए हैं. इनके निर्माण में पेड़ों की लकड़ी पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जाती है.

इसके अलावा कंपनी के अनुसार ये बोर्ड फॉर्मेल्डिहाइड जैसे हानिकारक केमिकल से मुक्त हैं और मजबूती के मामले में हाई डेंसिटी हाई मॉइस्चर रेजिस्टेंस (HDHMR) बोर्ड के बराबर प्रदर्शन देने के लिए तैयार किए गए हैं.

किसान को ही बनाया ब्रांड एंबेसडर

इस स्टार्टअप की कहानी में किसानों की भागीदारी भी खास है. मुरैना जिले के खेड़ा गांव के किसान बनवारी उन किसानों में शामिल रहे, जिन्होंने अपने खेत की पराली जलाने के बजाय उसे क्रास्ट को देने का फैसला किया.

क्रास्ट ने बनवारी को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया. इसके पीछे कंपनी की सोच यह थी कि जब कोई किसान खुद इस मॉडल से जुड़ेगा और दूसरे किसानों को बताएगा कि पराली जलाने के बजाय उससे कमाई भी की जा सकती है, तो ज्यादा किसान इससे जुड़ने के लिए प्रेरित होंगे.इस तरह किसान सिर्फ कच्चा माल उपलब्ध कराने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि इस पूरे पर्यावरण-अनुकूल मॉडल का हिस्सा बन रहा है.

कचरे से कमाई और पर्यावरण की सुरक्षा

शुभम सिंह का यह मॉडल सिर्फ एक स्टार्टअप की कहानी नहीं है, बल्कि कृषि अपशिष्ट को लेकर सोच बदलने की कोशिश भी है.पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है, जबकि उसका उपयोग करने से वही अवशेष एक आर्थिक संसाधन में बदल सकता है. इसके साथ ही अगर कृषि अवशेषों से पेपर, पैकेजिंग और बोर्ड जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं तो पेड़ों से मिलने वाले कच्चे माल और प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद मिल सकती है.

लंदन की नौकरी और विदेश की जिंदगी छोड़कर भारत लौटे शुभम सिंह ने जिस समस्या को एक अखबार की खबर में देखा था, उसे अपने लिए मिशन बना लिया.आज उनका क्रास्ट स्टार्टअप यह संदेश दे रहा है कि खेती का कचरा सिर्फ कचरा नहीं होता—सही तकनीक और सोच के साथ वही रोजगार, कमाई और पर्यावरण संरक्षण का जरिया बन सकता है.

 

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