
खेतों में फसल कटाई के बाद बचने वाली पराली लंबे समय से किसानों के लिए चुनौती रही है. कई जगह इसके निपटारे के लिए नरवाई जलाई जाती है, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है. लेकिन एमपी के नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा क्षेत्र में एक युवा उद्यमी ने इसी समस्या को अवसर में बदलने की मिसाल पेश की है. डमरू घाटी के युवा उद्यमी सोहिल मंसूरी ने कृषि अवशेषों को जलाने के बजाय उनका वैज्ञानिक और व्यावसायिक उपयोग शुरू कर किसानों की अतिरिक्त आय, स्वच्छ ऊर्जा और स्थानीय रोजगार की नई राह तैयार की है.
करीब तीन वर्ष पहले पंजाब की यात्रा के दौरान सोहिल मंसूरी ने देखा कि फसल कटाई के बाद खेतों में बचने वाले कृषि अवशेषों से बायोमास पेलेट तैयार किए जा रहे हैं. उन्होंने समझा कि जिस पराली को किसान अक्सर बेकार समझकर जला देते हैं, वही ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोगी कच्चा माल बन सकती है.
इसी अनुभव से प्रेरित होकर सोहिल ने अपने क्षेत्र में भी इस मॉडल को शुरू करने का फैसला किया. गाडरवारा लौटने के बाद उन्होंने बायोमास पेलेट के उत्पादन, तकनीक और बाजार की संभावनाओं को समझा. जानकारी जुटाने के बाद उन्हें पता चला कि इन पेलेट का इस्तेमाल ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के विकल्प के रूप में किया जा सकता है.विशेषज्ञों और संबंधित विभागों से मार्गदर्शन लेने के बाद उन्होंने ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स इकाई की स्थापना की.
सोहिल के इस प्रयास को मध्यप्रदेश शासन की एमपी एमएसएमई डेवलपमेंट पॉलिसी और एग्री इंफ्रा योजना के तहत 40 प्रतिशत वित्तीय सहायता भी मिली. सरकारी सहयोग से उन्हें कृषि अवशेषों के संग्रहण, प्रसंस्करण और बायोमास पेलेट उत्पादन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने में मदद मिली.
यह पहल बताती है कि सरकारी योजनाओं, तकनीक और युवा उद्यमिता को साथ जोड़ा जाए तो कृषि से जुड़ी समस्याओं को ग्रामीण स्तर पर रोजगार और व्यवसाय के अवसरों में बदला जा सकता है.
इस मॉडल को जमीन पर उतारने में सबसे बड़ी चुनौती किसानों को यह समझाना था कि खेत में बची पराली केवल कचरा नहीं है. सोहिल और उनकी टीम ने किसानों के बीच पहुंचकर उन्हें नरवाई जलाने से होने वाले नुकसान और कृषि अवशेषों के आर्थिक उपयोग की जानकारी दी.
कृषि अवशेषों को खेतों से आसानी से इकट्ठा करने के लिए किसानों को बेलर मशीन उपलब्ध कराने में भी सहयोग किया गया. इसके जरिए धान की पराली, गन्ने की पत्तियों और अन्य कृषि अवशेषों को एकत्र कर प्लांट तक पहुंचाया जाता है.
प्लांट में आधुनिक तकनीक से इन अवशेषों को प्रोसेस कर बायोमास पेलेट तैयार किए जाते हैं. इन पेलेट का उपयोग ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के विकल्प के रूप में किया जा सकता है.इस तरह खेत में जलाकर खत्म कर दी जाने वाली पराली अब एक उपयोगी संसाधन बन रही है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया तैयार कर रही है.
इस पहल का फायदा सिर्फ आर्थिक नहीं है। कृषि अवशेषों का खेतों से बाहर वैज्ञानिक उपयोग होने से नरवाई जलाने की जरूरत कम हो सकती है.इससे धुएं और वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है, वहीं खेतों में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवों के संरक्षण की दिशा में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
कृषि अवशेषों को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करने से एक ओर किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी ओर उद्योगों के लिए वैकल्पिक बायोमास ईंधन उपलब्ध होता है.
ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी नए अवसर पैदा कर रही है. इकाई के माध्यम से क्षेत्र के करीब 8 से 10 युवाओं को रोजगार मिला है.यानी पराली प्रबंधन का यह मॉडल खेत से शुरू होकर किसान की आय, स्थानीय उद्यमिता और रोजगार तक पहुंच रहा है.
सोहिल मंसूरी का मानना है कि कृषि अवशेषों को कचरा समझने के बजाय संसाधन के रूप में देखने की जरूरत है.अगर किसानों को सही तकनीक, बाजार और उचित व्यवस्था उपलब्ध हो, तो पराली जलाने जैसी समस्या को आर्थिक अवसर में बदला जा सकता है.उनकी पहल का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पराली समस्या नहीं, बल्कि सही उपयोग होने पर कमाई और ऊर्जा का संसाधन है.
नरसिंहपुर कलेक्टर रजनी सिंह ने ग्रीन इंडियो बायोफ्यूल्स इकाई का निरीक्षण किया.उन्होंने कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक उपयोग की इस पहल की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण, किसानों की आय बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया.उन्होंने इस तरह के प्रयासों को जिले के अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक बताया.
गाडरवारा की यह पहल दिखाती है कि अगर कृषि अवशेषों को सही तरीके से एकत्र कर उनका वैज्ञानिक उपयोग किया जाए तो खेतों में जलने वाली पराली को आय, ऊर्जा और रोजगार में बदला जा सकता है.
सोहिल मंसूरी की कहानी सिर्फ एक युवा उद्यमी की सफलता नहीं, बल्कि यह सोच बदलने की कहानी है—जिस पराली को कभी किसान समस्या समझकर जला देते थे, वही अब प्रगति का ईंधन बन सकती है.नरसिंहपुर से निकलती यह पहल किसानों, युवाओं और उद्यमियों को एक सीधा संदेश देती है—पराली जलाएं नहीं, उसे उपयोगी बनाएं और उससे कमाई का रास्ता तैयार करें.
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