
जमीन बेचकर किसान ने बनाया शहीद पार्कछत्तीसगढ़ के बालोद जिले के एक छोटे से गांव देवगहन में किसान लोकेंद्र साहू ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले जवानों की याद को सहेजने की अनोखी पहल की है. उन्होंने अपनी निजी कृषि भूमि पर ‘शहीद पार्क’ तैयार किया है, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों में आतंकियों और नक्सलियों से लड़ते हुए और युद्ध में शहीद हुए 18 वीर जवानों की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं.
इस पार्क की सबसे खास बात यह है कि इसे किसी सरकारी योजना या बड़े संस्थान की मदद से नहीं, बल्कि एक किसान ने अपनी मेहनत की कमाई से तैयार कराया है. शहीदों के सम्मान का जुनून लोकेंद्र साहू पर ऐसा चढ़ा कि उन्होंने इसके लिए अपनी जमीन तक बेच दी. प्रतिमाओं को बनवाने और स्थापित करने में उन्होंने करीब 10 लाख रुपये खर्च किए.
शहीद पार्क में मुंबई के 26/11 आतंकी हमले के दौरान अदम्य साहस दिखाने वाले तुकाराम ओंबले और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन समेत कई वीर जवानों की प्रतिमाएं लगाई गई हैं. इसके अलावा अलग-अलग आतंकी और नक्सली हमलों में शहीद हुए जवानों को भी यहां स्थान दिया गया है.
कारगिल युद्ध में शहीद हुए छत्तीसगढ़ के जवान दुर्वासा निषाद की प्रतिमा भी इस पार्क में स्थापित की गई है. इस तरह गांव की जमीन पर तैयार यह पार्क देश के अलग-अलग हिस्सों में मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने वाले जवानों की स्मृतियों को एक जगह सहेज रहा है.
लोकेंद्र साहू की कोशिश केवल प्रतिमाएं लगवाने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे उनका मकसद आने वाली पीढ़ी को इन शहीदों की कहानियों से जोड़ना है. वह चाहते हैं कि गांव के बच्चे और युवा पार्क में आएं, इन चेहरों को देखें और जानें कि देश की रक्षा के लिए इन वीर जवानों ने किस तरह अपना सर्वोच्च बलिदान दिया.
आमतौर पर गांवों में खेती की जमीन किसान की आजीविका का सबसे बड़ा आधार होती है. लेकिन लोकेंद्र ने इसी जमीन के एक हिस्से को शहीदों की याद के लिए समर्पित कर दिया. जरूरत पड़ी तो जमीन बेचकर प्रतिमाओं पर पैसा खर्च करने से भी पीछे नहीं हटे.

उनकी इस पहल ने देवगहन के खेतों के बीच एक ऐसी जगह तैयार कर दी है, जहां देशभक्ति सिर्फ भावनाओं में नहीं बल्कि प्रतिमाओं के रूप में दिखाई देती है. लोकेंद्र की इच्छा है कि यह स्थान आगे चलकर गांव और आसपास के युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बने.
शहीदों के लिए अथाह सम्मान रखने वाले लोकेंद्र साहू के व्यक्तित्व की एक और दिलचस्प कहानी क्रिकेट से जुड़ी हुई है. किसान बनने से पहले उन्होंने क्रिकेटर बनने का सपना देखा था.
करीब 25 साल पहले, वर्ष 2001-02 के दौरान अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह मुंबई तक पहुंच गए थे. वहां उन्होंने क्रिकेट की ट्रेनिंग भी ली. उम्मीद थी कि मेहनत के दम पर खेल में अपना भविष्य बनाएंगे, लेकिन जिंदगी ने उनके लिए कुछ और तय कर रखा था.
लोकेंद्र के पिता का पहले ही निधन हो चुका था. इसी दौरान उनके दादा का भी निधन हो गया. परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं. हालात ऐसे बने कि क्रिकेटर बनने का सपना छोड़कर उन्हें मुंबई से वापस अपने गांव देवगहन लौटना पड़ा.
क्रिकेटर बनने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन क्रिकेट के लिए उनका प्यार खत्म नहीं हुआ.
लोकेंद्र साहू ने अपने इसी जुनून को नए तरीके से जिंदा रखा. करीब पांच साल पहले अपनी बेटी के जन्मदिन के मौके पर उन्होंने गांव के खेल मैदान में महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की आदमकद प्रतिमा स्थापित करवाई.
लोकेंद्र के लिए सचिन केवल एक सफल क्रिकेटर नहीं हैं. वह उन्हें युवाओं के लिए मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य हासिल करने की प्रेरणा के तौर पर देखते हैं. यही कारण था कि उन्होंने सचिन की प्रतिमा को गांव के खेल मैदान में जगह दी, ताकि मैदान पर आने वाले बच्चों और युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिले.
लोकेंद्र साहू की क्रिकेट से जुड़ी कहानी यहीं खत्म नहीं होती. वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ित परिवारों की मदद के लिए भारतीय क्रिकेटर सूर्यकुमार यादव द्वारा मैच फीस दान किए जाने की बात से लोकेंद्र काफी प्रभावित हुए.
इसके बाद उन्होंने सूर्यकुमार यादव को सम्मान देने का अनोखा फैसला किया. उन्होंने करीब दो लाख रुपये की लागत से सूर्यकुमार यादव की आदमकद प्रतिमा तैयार कराई और उसे लेकर मुंबई पहुंचे. सूर्यकुमार के जन्मदिन पर लोकेंद्र ने उन्हें यह प्रतिमा भेंट की.
एक किसान की ओर से मिले इस अनोखे उपहार में क्रिकेट के प्रति जुनून के साथ एक खिलाड़ी के प्रति सम्मान भी शामिल था.
लोकेंद्र की भावनाओं का असर सूर्यकुमार यादव पर भी पड़ा. कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आया जब सूर्यकुमार ने अपनी प्रतिमा को अपने पास रखने के बजाय इसे लोकेंद्र साहू के गांव में ही स्थापित करने की इच्छा जताई.
अब देवगहन गांव में सचिन तेंदुलकर के साथ सूर्यकुमार यादव की प्रतिमा भी नजर आएगी. एक ओर गांव में देश के लिए बलिदान देने वाले 18 वीर जवानों की प्रतिमाएं अगली पीढ़ी को देशभक्ति और बलिदान की कहानी बताएंगी, तो दूसरी ओर क्रिकेट के सितारों की प्रतिमाएं बच्चों को खेल की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी.
लोकेंद्र साहू की कहानी एक किसान के शहीदों और क्रिकेट के प्रति प्रेम भर की कहानी नहीं है. इसके केंद्र में वह सपना भी है, जो पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से अधूरा छूट गया था.
लोकेंद्र खुद भले ही क्रिकेट के मैदान में अपना सपना पूरा नहीं कर पाए, लेकिन अब वह अपने गांव के बच्चों को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. शहीदों के बलिदान को खेत की मिट्टी से जोड़ने से लेकर सचिन तेंदुलकर और सूर्यकुमार यादव जैसे क्रिकेटरों की प्रतिमाएं स्थापित करने तक, उनकी कोशिश गांव में ऐसी यादें छोड़ने की है जिन्हें आने वाली पीढ़ियां देख और समझ सकें.
एक तरफ शहीद पार्क बच्चों को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों की कहानी बताएगा, तो दूसरी तरफ खेल मैदान में खड़े क्रिकेट के सितारे उन्हें अपने सपनों के पीछे मेहनत करने की प्रेरणा देंगे.
शायद यही लोकेंद्र साहू के अधूरे सपने की सबसे खूबसूरत परिणति भी है. वह खुद क्रिकेटर नहीं बन सके, लेकिन अपने गांव की जमीन पर शहीदों की वीरता और खिलाड़ियों की प्रेरणा को नई पीढ़ी के लिए हमेशा के लिए खड़ा कर दिया.(किशोर साहू की रिपोर्ट)
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