इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद कई ऐसे युवा हैं, जो खेती की ओर रुख कर रहे हैं. मसलन, अब नई पीढ़ी बढ़िया पैकेज की सैलरी वाली नौकरी से बेहतर खेती को मान रही है. ऐसे ही युवाओं की सूची में बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर के रहने वाले 45 वर्षीय राजीव रंजन भी शामिल हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और पुणे की एक मल्टीनेशनल कंपनी की अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी भी की, लेकिन अब वे नौकरी ड़कर 8 साल से बटन मशरूम की खेती कर रहे हैं. राजीव वैशाली जिले के पहले किसान थे, जिन्होंने बटन मशरूम की खेती करना शुरू किया था. कई सम्मान से सम्मानित राजीव कहते हैं कि जब वह नौकरी के दौरान डेनमार्क गए थे. वहां उन्होंने ने मशरूम की खेती के बारे में जाना.स्वदेश आकर इसकी खेती शुरू की.
राजीव अपने नाम के आगे इंजीनियर की जगह किसान लगाना ज्यादा पसंद करते हैं. अपनी नौकरी करने के दौरान इन्होंने कई बार देश विदेश का दौरा किया. वहीं बटन मशरूम के क्षेत्र में अलग पहचान बनाने के साथ कई महिलाओं व पुरुषों को रोजगार दे रहे हैं. ये कहते हैं कि नौकरी के दौरान भले एक अच्छी सैलरी मिल सकती है. लेकिन सामाजिक स्तर पर मेरी जो पहचान बनी है. वह मशरूम की खेती से ही संभव हुआ है.
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प्रगतिशील किसान राजीव रंजन कहते हैं कि वे नौकरी के दौरान डेनमार्क गए थे, जहां उन्होंने मशरूम की खेती को नजदीक से देखा. उसके बाद वह बिहार वापस आए. तो 2012 में पाया कि यहां मशरूम की खेती बड़े स्तर पर नहीं हो रही है. इसके बाद बचपन से ग्रामीण जीवन से लगाव होने के चलते स्वदेश वापस आए. 2015 में कृषि विभाग से 10 लाख एवं बैंक से 20 लाख रुपए की मदद से दो कमरे में बटन मशरूम की खेती की. आगे वे कहते हैं कि उस समय परिवार से लेकर हर कोई यही सवाल करता था. इस मशरूम की खेती में कोई दम नहीं है. एक अच्छी नौकरी छोड़कर बिहार में क्या करने आए हो.
किसान तक से बात करते हुए राजीव कहते हैं कि 2015-16 के शुरुआती समय में 2 कमरे से करीब प्रतिदिन 60 किलो मशरूम का उत्पादन होता था, लेकिन आज 6 कमरे से हर रोज का 500 किलो बटन मशरूम का उत्पादन हो रहा है. वहीं बाजार में 150 सौ रुपए प्रति किलो बिक जाता हैं. आगे कहते हैं कि इस बटन मशरूम की खेती से साल का 35 से 40 लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है. इसकी खेती के लिए तैयार होने वाला खाद भी खुद बनाते हैं. वहीं शुरुआती समय में बाहर से मंगवाना पड़ता था. करीब 22 कट्ठा एरिया में बटन मशरूम की कंपनी है और ये मशरूम उत्पादन के बाद बेकार खाद को 2 रुपए प्रति किलो के भाव से बेच देते हैं.
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राजीव रंजन कहते हैं कि 2015 में जब बटन मशरूम की खेती की थी तब अनुभव कम होने के कारण पूरे साल उत्पादन नहीं हो पा रहा था, लेकिन 2016 के बाद जब इस खेती से जुड़ी बेहतर जानकारी हासिल की गई तो उसके बाद से उत्पादन में बढ़ोतरी शुरू हुई है और आज उनके प्लांट से उत्पादित बटन मशरूम दूसरे राज्य के लोग भी खा रहे हैं. आगे कहते हैं कि अपनी माता निर्मला के नाम से मशहूर बटन मशरूम की पहुंच विदेशों तक है. जिनमें नेपाल, बंगाल के लोगों की थाली तक मशरूम पहुंच बना चुकी है.
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