खेतों से खुशहाली तक: पश्चिमी यूपी में किसान कारवां ने किसानों को दिखाया तरक्की का रास्ता

खेतों से खुशहाली तक: पश्चिमी यूपी में किसान कारवां ने किसानों को दिखाया तरक्की का रास्ता

उत्तर प्रदेश सरकार और India Today Group के संयुक्त प्रयास से आयोजित “किसान तक का किसान कारवां” किसानों के लिए जागरूकता और आधुनिक खेती का बड़ा मंच बनकर उभरा. 29 दिसंबर 2025 को अमरोहा से शुरू हुआ यह कारवां 4 मई 2026 को गौतम बुद्ध नगर पहुंचा. कहानी कारवां की’ इस सीरीज में आज पढ़िए प्रदेश के अंतिम वेस्टर्न प्लेन जोन की खेती, किसानों के अनुभव और सरकारी योजनाओं के असर की कहानी.

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खेतों से खुशहाली तक: पश्चिमी यूपी में किसान कारवां ने किसानों को दिखाया तरक्की का रास्ता

उत्तर प्रदेश सरकार और India Today Group के साझा प्रयास से आयोजित ‘किसान कारवां’ प्रदेश के किसानों के लिए जागरूकता, तकनीक और तरक्की का बड़ा मंच बनकर उभरा. 29 दिसंबर 2025 को अमरोहा से शुरू हुई यह यात्रा 4 मई 2026 को गौतम बुद्ध नगर में संपन्न हुई.इस दौरान कारवां प्रदेश के सभी 75 जिलों और 9 एग्री क्लाइमेटिक जोन तक पहुंचा.

किसान कारवां ने न केवल किसानों को उन्नत खेती, पशुपालन, बागवानी और जल संरक्षण की नई तकनीकों से जोड़ा, बल्कि मौके पर उनकी समस्याओं का समाधान भी किया. अब यह कारवां प्रदेश के अंतिम पड़ाव वेस्टर्न प्लेन जोन में पहुंच चुका है, जहां सात जिलों के किसानों को खेती के साथ पशुपालन और आधुनिक कृषि के गुर सिखाए गए.

हल्दी की खेती से बदली किसान की जिंदगी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब किसान पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर औषधीय और नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. शामली में किसान कारवां के दौरान बड़ी संख्या में हल्दी की खेती करने वाले किसान सामने आए.

इन्हीं में किसान राजेंद्र सिंह की कहानी किसानों के लिए प्रेरणा बनी. उन्होंने बताया कि पहले वह सामान्य खेती करते थे, लेकिन हल्दी की खेती अपनाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल गई. जैविक तरीके से उगाई गई उनकी हल्दी बाजार में 500 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है, जबकि सामान्य हल्दी 100 से 150 रुपये प्रति किलो के बीच बिकती है.

उन्होंने किसानों को जल संरक्षण, जैविक खेती और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि खेती में बदलाव ही किसानों की आय बढ़ाने का रास्ता है.

गन्ने के साथ सहफसली खेती से बढ़ रही आय

पश्चिम उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की प्रमुख नकदी फसल है लेकिन अब किसान केवल गन्ने पर निर्भर नहीं रह गए हैं. मेरठ स्थित Indian Institute of Farming Systems Research के वैज्ञानिकों की मदद से किसान गन्ने के साथ मूंगफली और पॉपुलर जैसे पेड़ों की खेती भी कर रहे हैं.

संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अमृतलाल मीणा ने बताया कि सहफसली खेती से किसानों को अतिरिक्त आय मिल रही है.इससे खेत की उर्वरता भी बनी रहती है और उर्वरकों की लागत कम होती है.किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए यह मॉडल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.

बासमती चावल से मिली वैश्विक पहचान

वेस्टर्न प्लेन जोन के किसान बड़े पैमाने पर बासमती धान की खेती कर रहे हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए मेरठ के मोदीपुरम में Basmati Export Development Foundation की स्थापना की गई.

संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रितेश शर्मा ने बताया कि भारत से बासमती चावल का निर्यात 150 से अधिक देशों में हो रहा है, जिससे देश को हर साल लगभग 60 हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही है।

उन्होंने किसानों से बेहतर किस्मों के चयन और कम पानी वाली उन्नत तकनीकों को अपनाने की अपील की, ताकि उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ सकें.

नकली बीज और कीटनाशकों के खिलाफ अभियान की जरूरत

किसानों के सामने नकली बीज, कीटनाशक और उर्वरकों की समस्या लगातार बढ़ रही है. किसान कारवां के मंच से इस मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया गया.

Dhanuka Agritech के अध्यक्ष डॉ. आर. जी. अग्रवाल ने कहा कि कृषि क्षेत्र में नकली उत्पादों के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाने की जरूरत है. उन्होंने सुझाव दिया कि बीज, उर्वरक और कीटनाशकों पर क्यूआर कोड अनिवार्य किया जाए, ताकि किसान आसानी से असली और नकली उत्पाद की पहचान कर सकें.उन्होंने यह भी बताया कि उनकी कंपनी ने राजस्थान में जल संरक्षण के लिए छह चेक डैम बनाए हैं.

गन्ने की उन्नत किस्म अपनाने की सलाह

बागपत, हापुड़ और बुलंदशहर जैसे जिलों में आज भी किसान गन्ने की 0238 किस्म की खेती कर रहे हैं, जबकि यह किस्म रेड रॉट बीमारी से प्रभावित हो चुकी है.

बागपत के Krishi Vigyan Kendra Baghpat के गन्ना वैज्ञानिक डॉ. विकास कुमार ने किसानों को बड चिप नर्सरी तकनीक अपनाने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि किसान रोग प्रतिरोधी और उन्नत किस्मों का चयन करें, ताकि उत्पादन सुरक्षित और लाभदायक बना रहे.

पराली नहीं, खाद बनाएं किसान

प्रदेश में धान और गेहूं की कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या लगातार बढ़ रही है. किसान कारवां के माध्यम से किसानों को बताया गया कि पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है और लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं.

विशेषज्ञों ने किसानों को डी-कंपोजर तकनीक के जरिए खेत में ही पराली से जैविक खाद बनाने की सलाह दी. इससे खेत की मिट्टी अधिक उपजाऊ बन सकती है और उत्पादन लागत भी कम होती है.

महिला किसानों ने पेश की मिसाल

किसान कारवां में महिला किसानों की सफलता की कहानियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं.गाजियाबाद की महिला किसान मंजू कश्यप ने बताया कि उनके पास न जमीन थी और न ही खुद का तालाब.सरकार की मदद से तालाब का पट्टा मिलने के बाद उन्होंने मछली पालन शुरू किया. आज वह समेकित कृषि प्रणाली के तहत मछली पालन के साथ मुर्गी पालन भी कर रही हैं और दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं.

नीलगाय और बंदरों से बचाव के लिए किसानों ने बदली खेती

हापुड़ और आसपास के जिलों में बंदरों और नीलगायों से परेशान किसान अब फसलों में बदलाव कर रहे हैं. यहां के किसान नींबू और गेंदे के फूलों की खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं, क्योंकि इन फसलों को जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते.

किसान वकार अहमद ने बताया कि नींबू और गेंदे की खेती से उन्हें पहले की तुलना में अधिक मुनाफा हो रहा है. बाजार में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है.

मिलेट्स से महिला किसान को मिली नई पहचान

बुलंदशहर की महिला किसान संतोष राजपूत ने मिलेट्स यानी श्री अन्न की खेती और प्रसंस्करण के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है. उन्होंने किसान उत्पादक संगठन (FPO) बनाकर मिलेट्स कुकीज़ का निर्माण शुरू किया.

आज उनके उत्पादों की मांग दिल्ली तक पहुंच चुकी है और इससे उन्हें अच्छी आय प्राप्त हो रही है.

किसानों को उद्यमी बनने की जरूरत

किसान कारवां के मंच से पद्मश्री सम्मानित किसान Bharat Bhushan Tyagi ने किसानों को उद्यमी सोच अपनाने की सलाह दी.उन्होंने कहा कि केवल खेती करने से किसानों की आय नहीं बढ़ेगी. किसानों को अपने उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रोसेसिंग पर ध्यान देना होगा. अगर किसान उद्यमी बनेंगे तो उनकी आमदनी दो से तीन गुना तक बढ़ सकती है.

किसान कारवां ने प्रदेश के किसानों को यह संदेश दिया कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक खेती, जल संरक्षण, प्रसंस्करण और उद्यमिता ही भविष्य की खेती का रास्ता है. 

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