केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और सीएम मोहन यादव (फोटो- X@DrMohanYadav51)मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार इन दिनों गेहूं खरीदी को लेकर हर तरफ से घिरती नजर आ रही है. एक ओर खरीद प्रकिया में आ रही प्रशासनिक दिक्कतों से परेशान किसान विरोध के स्वर उठा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक स्तर पर मोहन यादव अपने-पराए दोनों से घिरे नजर आ रहे हैं. मोहन सरकार की पहली और सबसे बड़ी चूक यह रही कि सरकारी खरीदी समय पर शुरू नहीं हुई. नतीजा यह हुआ कि किसानों को 20-25 दिनों से ज्यादा तक अपनी फसल निजी व्यापारियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेचने पर मजबूर होना पड़ा.
यह महज एक प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि उस किसान की जेब पर सीधी चोट थी, जो रबी की फसल में महीनों की मेहनत लगाता है और न्यूनतम समर्थन मूल्य की उम्मीद में सरकारी मंडी का इंतजार करता है. जब खरीदी शुरू हुई भी तो मंडियों में तुलाई की समस्या और ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग की अव्यवस्था ने नई मुसीबत खड़ी कर दी. इससे राज्य सरकार को बार-बार स्लॉट बुकिंग की तारीख बढ़ानी पड़ी और खरीद की अंतिम तारीख आगे बढ़ाने के संकेत भी देने पड़े.
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू है पूर्व सीएम और वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका. वे अपने संसदीय क्षेत्र विदिशा और आसपास के डिविजन में गेहूं खरीदी की लगातार समीक्षा कर रहे हैं, अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं और समस्याओं का सार्वजनिक रूप से जिक्र कर रहे हैं. कई बार तो शिवराज ने राज्य सरकार से पहले ही यह बात कह दी कि जरूरत पड़ने पर खरीद की तारीख और लक्ष्य बढ़ाया जाएगा, जिसके बाद राज्य सरकार के मंत्रियों और खुद मुख्यमंत्री को भी इसे लेकर बयान देना पड़ा.
यह देखने में भले ही सहयोग जैसा लगे, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का नजरिया कुछ और ही कहता है. जब कोई वरिष्ठ नेता राज्य सरकार से पहले बोलता है तो अनजाने में ही सही, वह यह संदेश देता है कि राज्य सरकार की पकड़ ढीली है. शिवराज भले ही मंच से मोहन यादव से मित्रवत सबंध और एकजुटता की बात दोहराते रहें, लेकिन जमीन पर नजर आने वाली तस्वीर कुछ और ही कहती है. यह भाजपा के भीतर उस अंदरखाने की असहजता को उजागर करती है, जो दो बड़े नेताओं के बीच स्वाभाविक रूप से बनी रहती है.
मालूम हो कि शिव‘राज’ के किसानों से किए चुनावी वादे आज भी मोहन सरकार की गले की फांस बने हुए हैं. चाहे वो गेहूं के लिए बोनस राशि देकर 2700 रुपये प्रति क्विंटल और धान के लिए बोनस सहित 3100 रुपये प्रति क्विंटल का भाव देने की घोषणा या महिलाओं से लाडली बहना योजना के 3000 हजार रुपये महीने की आर्थिक मदद देने का वादा हो- इन सभी को लेकर राज्य सरकार हमेशा कांग्रेस के निशाने पर रहती है.
बीजेपी के लिए यह बड़ी चुनौती इसलिए भी है, क्योंकि जब पड़ोसी राज्य राजस्थान में उनकी ही सरकार में वे 150 रुपये बोनस देकर किसानों को 2735 रुपये प्रति क्विंटल का भाव दे रहे हैं तो वहीं धान किसानों को छत्तीसगढ़ में बोनस सहित 3100 का भाव दिया जा रहा है. लेकिन मध्य प्रदेश सरकार को आए दिन किसी न किसी कारण से कर्ज लेना पड़ रहा है.
दूसरी ओर देखें तो कांग्रेस के लिए गेहूं खरीदी की समस्या, किसानों के मुद्दे सत्ता में वापसी करने की चाबी हैं, जो उसे बड़े कमबैक का ‘मौका’ देंगे. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने तो राज्य सरकार को बड़े आंदोलन का अल्टीमेटम दे दिया है. उन्होंने कहा कि अगर एमपी सरकार 7 दिन के अंदर, जिन किसानों को एमएसपी से कम भाव मिला है, उन्हें अंतर की राशि का भुगतान नहीं करती है तो वे 7 मई को आगरा-मुंबई हाईवे जाम जाम करेंगे.
वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ भी मोहन सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं और लगातार किसानों के मुद्दे पर हमलावर हैं. हाल ही में टिमरनी से कांग्रेस विधायक भी गेहूं से लदी ट्रैक्टर-ट्रॉली सहित विधानसभा पहुंचे और कम भाव, खरीदी में समस्या को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. इससे साफ है कि कांग्रेस 2028 विधानसभा चुनाव को लेकर अब कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती है.
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