बेतिया राज की जमीन पर संग्रामबिहार सरकार द्वारा बेतिया राज की जमीन को सरकारी संपत्ति घोषित किए जाने के फैसले के खिलाफ अब किसानों ने खुलकर विरोध शुरू कर दिया है. चम्पारण की ऐतिहासिक धरती एक बार फिर आंदोलन की गवाह बनी. हजारों की संख्या में किसान, मजदूर और जमीन मालिक जिला मुख्यालय पहुंचे और सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया. किसानों का कहना है कि वे कई वर्षों से इन जमीनों पर खेती करते आ रहे हैं और अब उन्हें बेदखल करने की कोशिश की जा रही है. इस फैसले को लेकर लोगों में गहरा आक्रोश है.
किसान संगठनों के आह्वान पर शहर के नरसिंह बाबा आश्रम से कचहरी चौक तक एक विशाल आक्रोश मार्च निकाला गया. प्रदर्शन में शामिल लोगों के हाथों में तख्तियां और बैनर थे. वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रख रहे थे, लेकिन सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की गई. कचहरी चौक पर पहुंचकर यह मार्च धरना प्रदर्शन में बदल गया. हजारों लोगों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह मुद्दा अब बड़ा आंदोलन बन चुका है. किसानों ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर अपने हक की रक्षा करने की मांग की.
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कोठियों से जुड़ी जमीन का इतिहास बहुत पुराना है. बताया जाता है कि वर्ष 1860 में बेतिया राज से यह जमीन इंडिगो कंपनी ने लगभग 84 लाख रुपये में खरीदी थी. समय के साथ यह जमीन विवादों में घिर गई. किसानों का आरोप है कि सरकार की नई नीतियां उनके हित में नहीं हैं. उनका कहना है कि जिन गरीब और भूमिहीन किसानों ने वर्षों से इन जमीनों पर मेहनत की है, उन्हें अब हटाने की कोशिश की जा रही है. इससे उनका जीवन और आजीविका दोनों प्रभावित होंगे.
किसान नेताओं का कहना है कि सरकार को अपना निर्णय वापस लेना चाहिए. संघर्ष समिति से जुड़े नेताओं ने आरोप लगाया कि गलत कानूनों के कारण मजदूरों और किसानों का आर्थिक और सामाजिक शोषण हो रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने जल्द कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया तो यह आंदोलन जिला स्तर से राज्य स्तर तक फैलाया जाएगा. किसानों का कहना है कि वे अपने हक के लिए शांतिपूर्ण लेकिन मजबूत संघर्ष करेंगे.
चम्पारण की धरती पहले भी नील की खेती और जमींदारी शोषण के खिलाफ आंदोलनों की साक्षी रही है. यहां के लोगों का कहना है कि आज फिर वही हालात बनते दिख रहे हैं. इसलिए वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हो गए हैं. किसानों का मानना है कि जमीन केवल उनकी रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और भविष्य भी है. यही कारण है कि बेतिया राज की जमीन का मुद्दा अब एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है. (सचिन पांडे का इनपुट)
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