अकोला में जल संकटभीषण गर्मी के बीच महाराष्ट्र के अकोला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर खारा पानी प्रभावित इलाकों में जल संकट ने विकराल रूप ले लिया है. हालात इतने गंभीर हैं कि लोगों को तीन-चार दिन नहीं, बल्कि 20 से 25 दिन के अंतराल के बाद पानी नसीब हो रहा है, वह भी महज 15 से 30 मिनट के लिए, इसी समस्या से परेशान सैकड़ों ग्रामीणों ने आज महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण (जल बोर्ड) के कार्यालय पर जोरदार घेराव कर प्रशासन के खिलाफ तीव्र नाराजगी जताई.
ग्रामीणों का आरोप है कि यह प्राकृतिक नहीं बल्कि “मानव निर्मित जल किल्लत” है, जो अधिकारियों की लापरवाही और खराब नियोजन का नतीजा है. प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा है कि कागजों में योजनाएं भले ही ठीक दिखाई जाती हों, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद खराब है. उन्होंने अधिकारियों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वे खुद गांवों में आकर हालात देखें.
प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि जब तक पानी की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक वे आंदोलन जारी रखेंगे और कार्यालय के सामने से नहीं हटेंगे. ग्रामीणों का कहना है कि अकोला, जो देश के सबसे गर्म जिलों में गिना जाता है, वहां इस तरह की जल किल्लत प्रशासन की विफलता को दर्शाती है.
सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन क्षेत्रों में जमीन का पानी खारा है, जो न तो पीने योग्य है और न ही उपयोग के लायक. ऐसे में पूरी निर्भरता सरकारी जल आपूर्ति पर है, जो समय पर नहीं मिल रही. ग्रामीणों ने बताया कि शादी-ब्याह के इस सीजन में हालात और भी मुश्किल हो गए हैं, जिन घरों में समारोह हैं, वहां पानी की भारी किल्लत के कारण आयोजन करना चुनौती बन गया है. ग्रामीणों ने यह भी बताया कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि पिछले 40-50 वर्षों से लगातार बनी हुई है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया है. जल संकट के चलते कई युवाओं के विवाह तक प्रभावित हो रहे हैं.
आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने एक अनोखा विरोध भी दर्ज कराया. वे अपने साथ मिट्टी का घड़ा, प्लास्टिक के पाइपलाइन, एक नल और उस पर चूड़ियां बांधकर लाए थे, जिसे अधिकारियों को भेंट देने की तैयारी की गई थी. यह प्रतीकात्मक विरोध प्रशासन के प्रति गुस्से और निराशा को दर्शा रहा था.
वहीं, जल प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि जल आपूर्ति का नियोजन सही तरीके से किया जा रहा है और जल्द ही स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया जाएगा. हालांकि, ग्रामीण इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे “सिर्फ कागजी योजना” बता रहे हैं. अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन इस गंभीर जल संकट का समाधान कितनी जल्दी निकाल पाता है, क्योंकि फिलहाल अकोला के ग्रामीण इलाकों में “पानी” सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है.
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