
केन बेतवा लिंक परियोजना का विरोधमध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बिजावर क्षेत्र में ग्राम ढोढन और पलकोआ के हजारों किसान केन बेतवा लिंक परियोजना का विरोध कर रहे हैं. इस परियोजना से प्रभावित किसान अपने नेता अमित भटनागर के साथ पिछले 10 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं जिससे बांध निर्माण का काम बंद हो चुका है. बांध निर्माण में लगे अधिकारी और कर्मचारी वापस लौट चुके हैं. वहीं प्रशासन प्रदर्शन को बंद करने के लिए किसानों पर दबाव बना रहा है. किसानों का आरोप है कि प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले अमित भटनागर को वापस कराने के लिए परिवार पर दबाव बनाया जा रहा है.
किसानों ने आरोप में कहा है कि प्रशासन उन्हें नोटिस देते हुए घर और स्कूल-कॉलेज की नपाई करते हुए बुलडोजर चलाने की धमकी दे रहा है. इस तरह की बात अमित भटनागर के परिजनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कही और अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए. किसानों के प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले अमित भटनागर का कहना है कि उनके परिवार को परेशान किया जा रहा है.
केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ विस्थापित लोग न्याय और उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं. अभी हाल में इसके विरोध में एक अनोखा प्रदर्शन देखा गया जिसमें एक विस्थापित महिला प्रशासन की कार्रवाई के विरोध में चिता पर लेटी हुई है. प्रदर्शनकारी लोकतंत्र की कथित हत्या और किसानों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ नारे लगाते दिखे. किसानों ने केन नदी प्रोजेक्ट और मचकवान बांध के कारण विस्थापित हुए लोगों के लिए न्याय की मांग उठाई.
पन्ना जिले में इस प्रोजेक्ट से प्रभावित गांव, जिनमें मझगवां और रुंज शामिल हैं, अपनी मांगें मनवाने के लिए कंस्ट्रक्शन साइट पर ही डटे रहे. प्रदर्शनकारी विस्थापित परिवारों के लिए 12.5 लाख रुपये के मुआवजे वाले पैकेज की मांग कर रहे हैं. उनका दावा है कि इस इलाके के दूसरे बांधों से प्रभावित लोगों के लिए भी इसी तरह के मुआवजे की मांग की गई थी.

पन्ना के एडिशनल कलेक्टर आलोक मार्को और SDM सतीश नागवंशी दिन में प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे और आंदोलनकारियों के साथ विस्तार से बातचीत की. अधिकारियों ने कहा कि मुआवजा सरकारी गाइडलाइंस और जमीन अधिग्रहण कानून के मुताबिक ही दिया गया है.
नागवंशी ने कहा, "रुंज प्रोजेक्ट में 99 फ़ीसदी पेमेंट हो चुका है, जबकि केन-बेतवा प्रोजेक्ट से प्रभावित गांवों—जिनमें कटेरी, बलेटा, गदरा और कोनी शामिल हैं—में 90 फीसदी से ज्यादा मुआवजा दिया जा चुका है. अगर किसी का नाम छूट गया है, तो हम कागजात के आधार पर दोबारा सर्वे करने के लिए तैयार हैं."
उन्होंने बताया कि प्रशासन ने विस्थापित लोगों के एक प्रतिनिधि को भी अपने साथ लिया था, ताकि उन्हें रिकॉर्ड की फोटोकॉपी दी जा सके.
प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि मझगवां और विश्रामगंज बांधों के लिए तय 5 लाख रुपये के पुराने मुआवजे पैकेज को बढ़ाकर 12.5 लाख रुपये कर दिया जाए, ताकि यह धोदन बांध के विस्थापित लोगों को दिए गए मुआवजे के बराबर हो जाए. हालांकि, प्रशासन ने इस मांग को "नीतिगत रूप से असंभव" बताया है, क्योंकि इससे जुड़े फैसले तो सालों पहले ही हो चुके थे.
इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भाटनागर ने प्रशासन के दावों को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभावित लोगों में से सिर्फ 60 फीसदी को ही मुआवजा मिला है, और इसमें भी कई बड़ी गड़बड़ियां हैं.
उन्होंने कहा, "अगर ग्राम सभाएं और सारी प्रक्रियाएं संवैधानिक तरीके से पूरी की गई हैं, तो हम अपना प्रदर्शन खत्म कर देंगे, लेकिन अगर गैर-संवैधानिक तरीकों से हमारी जमीन का एक इंच भी लेने की कोशिश की गई, तो हम उसे हरगिज नहीं देंगे."

चूंकि यह प्रदर्शन स्थल पन्ना टाइगर रिजर्व के मुख्य क्षेत्र (core area) में आता है, इसलिए प्रशासन ने वहां सुरक्षा के इंतजाम और भी कड़े कर दिए हैं.
कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने प्रदर्शनकारियों से अपील की कि वे टाइगर रिजर्व के इस प्रतिबंधित क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखें और बातचीत के जरिए इस मसले को सुलझाएं.
उन्होंने यह भी कहा कि अभी सर्वे का काम चल रहा है, और कोई भी हकदार व्यक्ति मुआवजे से वंचित नहीं रहेगा. डॉक्टरों की एक टीम प्रदर्शनकारियों की जांच करने के लिए घटनास्थल पर पहुंची—जो वहां जरूरी सामान के साथ डेरा डाले हुए थे—लेकिन बिना जांच किए ही लौट गई.(लोकेश चौरसिया का इनपुट)
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