जूट को छोड़ मकई की खेती को क्यों अपना रहे बंगाल के किसान, क्या है वजह?

जूट को छोड़ मकई की खेती को क्यों अपना रहे बंगाल के किसान, क्या है वजह?

अधिकांश किसानों का कहना है कि जूट की खेती में अब कोई मुनाफ़ा नहीं है. पर वहीं दूसरी तरफ मक्के की खेती से मुनाफ़ा दोगुना हो जाता है और मेहनत भी कम लगती है. यही कारण है कि किसान जूट की खेती के बजाय  मक्के की खेती पर ध्यान दे रहे हैं.

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जूट को छोड़ मकई की खेती को क्यों अपना रहे बंगाल के किसान, क्या है वजह?जूट की खेती (सांकेतिक तस्वीर)

जूट की खेती पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर की जाती है. इसकी खेती यहां की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. खास कर दक्षिण दिनाजपुर जिले में यह किसानों की आजीविका का प्रमुख स्रोत माना जाता है. पर इसके बावजूद यहां के किसान अब जूट की खेती से हटकर मक्का की खेती को अपना रहे हैं. लंबे समय से यहां पर किसान जूट की खेती करते आ रहे हैं. ऐसे में मकई के खेती की तरफ किसानों का शिफ्ट होना कई सवाल खड़े करता है. किसानों का कहना है कि पारंपरिक जूट की खेती में अब कोई मुनाफा नहीं होता है. पूंजी लगाने के बाद भी कमाई कम होती है, इसलिए किसान इसकी खेती से दूर जा रहे हैं.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश किसानों का कहना है कि जूट की खेती में अब कोई मुनाफ़ा नहीं है. पर वहीं दूसरी तरफ  मक्के की खेती से मुनाफ़ा दोगुना हो जाता है और मेहनत भी कम लगती है. यही कारण है कि किसान जूट की खेती के बजाय मक्के की खेती पर ध्यान दे रहे हैं. कुछ किसानों ने यह भी कहा कि जूट की खेती में अधिक समय भी लगता है. जूट को काटने और रोपण से पहले जलाशय तक ले जाने में मजदूरी का भी खर्च आता है जिससे कृषि लागत का खर्च बढ़ जाता है. इसके अलावा अगर पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो जूट को सड़ने के लिए भी इसे जलाशयों तक ले जाना पड़ता है. इन्हीं सब कारणों को देखते हुए किसानों का झुकाव जूट की खेती की तरफ हो रहा है.

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इसलिए जूट की खेती छोड़ रहे किसान

बंगाल में 2019 में मक्के की खेती को लेकर एक अध्ययन किया गया था. इसके तहत 60 किसानों से मकई और जूट की खेती को लेकर बात की गई थी और उनसे उनकी खेती की प्राथमिकता के बारे में पूछा गया था. इस बातचीत के विश्लेषण में यह बात सामने आई कि पूंजी की कमी, लाभकारी बाजार मूल्य, उच्च श्रम लागत, मिट्टी की खराब गुणवत्ता और अपर्याप्त सिंचाई जल, उन्नत किस्मों के बीजों की उपलब्धता, उच्च इनपुट लागत और उचित बाजार के अभाव में किसान जूट की खेती से दूर जा रहे हैं. किसानों ने इन कारणों को गिनाए जिसके चलते वे जूट की खेती नहीं करना चाहते हैं. 

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मकई की खेती से फायदा

मक्के की खेती करने वाले किसान बताते हैं कि मक्का की खेती में जूट से अधिक का मुनाफा होता है. मकई की खेती तीन महीने के अंदर तैयार हो जाती है और किसान इसकी कटाई कर सकते हैं. मकई की खेती में मजदूरी भी कम लगती है. उन्होंने बताया कि प्रति बीघे की दर से किसानों को अधिक फायदा होता है. रिपोर्ट के अनुसार, मक्के की खेती में प्रति बीघा लगभग 10 से 12,000 रुपये का खर्च आता है. दूसरी ओर जूट की खेती अधिक मजदूरी और पूंजी मांगती है. यही वजह है कि किसान जूट के बदले मक्के को अपना रहे हैं.

 

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