गुजरात में किसानों का विरोध प्रदर्शन जारीगुजरात में किसानों ने खेती की जमीन पर बिजली के खंभे लगाने को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी रखा है. मोरबी में किसान आमरण अनशन भी कर रहे हैं. इन विरोध प्रदर्शनों के बाद, सरकार अब बिजली के खंभों के लिए एक नई नीति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है. सरकार का कहना है कि वह जल्द ही इसे लेकर नई नीति लेकर आएगी ताकि लंबे दिनों से चला आ रहा विवाद रुक जाए.
विरोध प्रदर्शन करने वाले किसानों का कहना है कि बिजली के बुनियादी ढांचे से जुड़ी ये परियोजनाएं उनकी कीमती जमीन को नुकसान पहुंचाती हैं और वे इस नुकसान के लिए उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं. चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच, गुजरात सरकार बिजली के खंभे और ट्रांसमिशन लाइनें लगाने से प्रभावित किसानों के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक अलग नीति बनाने पर विचार कर रही है. उम्मीद है कि प्रस्तावित नीति से मुआवजे के नियम ज्यादा पारदर्शी और किसानों के लिए फायदेमंद होंगे.
सरकार ने कहा है कि उसने हमेशा किसानों का समर्थन किया है और अतीत में कई जटिल मुद्दों को सुलझाया है. अधिकारियों ने बातचीत पर जोर दिया है और विरोध को और फैलने से रोकने के लिए ग्रामीण स्तर पर बैठकें आयोजित करने की योजना बनाई है. किसान लंबे समय से बिजली के खंभों के कारण खेती की जमीन के नुकसान के लिए उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित राजनीतिक दलों ने भी किसानों के मुद्दे का समर्थन किया है.
किसान संगठनों का कहना है कि जब तक नई नीति की आधिकारिक घोषणा नहीं हो जाती, वे अपना विरोध जारी रखेंगे. किसानों ने कहा है कि यह आंदोलन गैर-राजनीतिक है और उन्होंने विरोध मंच पर राजनीतिक नेताओं को न आने देने का फैसला किया है, भले ही ऐसे आरोप लग रहे हों कि पार्टियां आंदोलन पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रही हैं.
दूसरी ओर, मोरबी जिले के जेतपर गांव में किसानों का आंदोलन अब और तेज हो गया है. किसानों ने अपने आंदोलन के दूसरे चरण की शुरुआत करते हुए आमरण अनशन शुरू कर दिया है. उन्होंने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक वे पीछे नहीं हटेंगे.
दरअसल, पिछले करीब 15 दिनों से मोरबी तहसील के जेतपर गांव के किसान बिजली कंपनी के खिलाफ मुआवजे को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन पर खंभे लगाए गए हैं, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा नहीं दिया गया. अलग-अलग तरीकों से विरोध दर्ज कराने के बावजूद जब प्रशासन और कंपनी की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो किसानों ने आंदोलन को और तेज करते हुए अनशन का रास्ता अपनाया.
प्रदर्शन कर रहे किसानों ने कहा कि जिसे देश “अन्नदाता” कहता है, आज वह खुद सड़कों पर बैठने को मजबूर है, जो बेहद दुखद है. उनका कहना है कि उनकी मांगें पूरी तरह जायज हैं और संविधान के तहत रखी गई हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी अनदेखी की जा रही है.
किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि बिना उनकी सहमति के जबरन खेतों में बिजली के खंभे लगाए जा रहे हैं, जो तानाशाही रवैये को दर्शाता है. उन्होंने इस कार्रवाई की तुलना अंग्रेजों के दौर से करते हुए इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया.
किसानों की मुख्य मांग है कि उनकी जमीन का मुआवजा बाजार दर (वास्तविक कीमत) के आधार पर दिया जाए, न कि सरकारी सर्किल रेट (जंत्री) के अनुसार. उनका कहना है कि जंत्री दर बेहद कम होती है, जिससे उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिल पाता. किसानों ने यह भी कहा कि अगर सरकार जंत्री दर से ही भुगतान करेगी, तो वे भी अन्य सुविधाओं और विकल्पों की मांग करेंगे. किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें जल्द पूरी नहीं की गईं, तो वे अपना आंदोलन और उग्र करने के लिए मजबूर होंगे.
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