सुधाकर सिंह बिहार सरकार की ओर से ग्राम पंचायतों को अलग-अलग प्रकार के टैक्स और शुल्क लगाने का अधिकार देने के फैसले पर राजनीति तेज हो गई है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद और पूर्व कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने इस फैसले का विरोध करते हुए इसे ग्रामीण जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाला कदम बताया है. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब गांवों में महंगाई, बेरोजगारी और कम आमदनी जैसी समस्याएं पहले से मौजूद हैं, तब नए टैक्स लगाने का फैसला गरीब और मेहनतकश लोगों की मुश्किलें और बढ़ा देगा.
इस मुद्दे पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और भारत सरकार के पूर्व योजना आयोग के पूर्व सचिव डॉ. संतोष मेहरोत्रा भी मौजूद रहे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार सरकार की ओर से 15 जुलाई 2026 को कैबिनेट में मंजूर की गई बिहार ग्राम पंचायत (टैक्स और शुल्क) नियमावली-2026 पर सवाल उठाए गए.
सुधाकर सिंह ने कहा कि बिहार आर्थिक रूप से अभी भी देश के पिछड़े राज्यों में गिना जाता है. यहां बड़ी संख्या में लोग खेती, दिहाड़ी मजदूरी, छोटे व्यापार और पारंपरिक रोजगार के जरिए अपना जीवन चलाते हैं. ऐसे में पंचायतों को नए टैक्स लगाने का अधिकार मिलने से सबसे ज्यादा असर गरीब और कम कमाई करने वाले लोगों पर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि ठेला, खोमचा, रेहड़ी, रिक्शा, टमटम, बैलगाड़ी और हाथगाड़ी चलाने वाले लोगों की कमाई पहले से ही सीमित है. अगर इन पर हाउस टैक्स, नल-जल शुल्क, रजिस्ट्रशन शुल्क या अन्य स्थानीय टैक्स लगाए जाएंगे, तो उनके लिए परिवार का खर्च चलाना और मुश्किल हो जाएगा.
सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि इस नियमावली का असर किसानों पर भी पड़ेगा. उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों को सिंचाई, गांव में मेले लगाने और सड़क पर लाइट जैसी सुविधाओं के लिए भी टैक्स देना पड़ सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि बढ़ई, लोहार, कुम्हार, नाई, धोबी, मोची, दर्जी, राजमिस्त्री, सब्जी-फल और दूध बेचने वाले सहित अन्य छोटे कारोबारियों की कमाई रोजाना की मेहनत पर निर्भर करती है. ऐसे में अतिरिक्त टैक्स उनकी कमाई को और कम कर देगा.
आरजेडी नेता ने कहा कि अगर छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ बढ़ेगा, तो उनकी लागत भी बढ़ेगी. इसका असर सामान और सेवाओं की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण बाजारों की खरीदारी क्षमता कमजोर हो सकती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने कहा कि ग्रामीण परिवार पहले से ही बढ़े हुए पेट्रोल-डीजल, बिजली और अन्य खर्चों का बोझ उठा रहे हैं. ऐसे में पंचायत स्तर पर इस टैक्स को लगाना सही नहीं है.
सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया कि सरकारी दफ्तरों में पहले से ही भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की शिकायतें मिलती रहती हैं. ऐसे में उन्होंने कहा कि पंचायतों को टैक्स वसूलने का अधिकार मिलने से भ्रष्टाचार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं. उन्होंने आशंका जताई कि भविष्य में गरीब लोगों को टैक्स या शुल्क न देने की स्थिति में सरकारी सेवाओं और योजनाओं से जुड़ी परेशानियों का सामना भी करना पड़ सकता है.
उन्होंने कहा कि पंचायतों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का तरीका ग्रामीण गरीबों पर नए टैक्स लगाना नहीं होना चाहिए. उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार पंचायतों को पर्याप्त सब्सिडी, वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार संसाधन और विकास योजनाओं के लिए समय पर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए. उनका कहना है कि अगर सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती है, तो इसका सीधा असर बिहार के किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
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