ईरान तनाव का असर: तेल की महंगाई से उपभोक्ता परेशान, लेकिन सरसों किसानों की चमकी किस्मत

ईरान तनाव का असर: तेल की महंगाई से उपभोक्ता परेशान, लेकिन सरसों किसानों की चमकी किस्मत

ईरान संकट से जहां खाद्य तेल महंगे हुए, वहीं भारत में सरसों और अन्य तिलहन किसानों को इसका बड़ा फायदा मिला है. विदेशी तेल की सप्लाई घटने से घरेलू मांग बढ़ी और कीमतें MSP से ऊपर पहुंच गईं.

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ईरान तनाव का असर: तेल की महंगाई से उपभोक्ता परेशान, लेकिन सरसों किसानों की चमकी किस्मतदेश में सरसों के दाम में उछाल

ईरान युद्ध का असर देश-दुनिया के कई सेक्टरों पर दिख रहा है. यह असर खराब है. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ईरान युद्ध ने केवल नुकसान ही पहुंचाया है. इसके कुछ फायदे भी नजर आ रहे हैं, खासकर भारत के खाद्य तेल के क्षेत्र में. खाड़ी देशों में जारी तनाव की वजह से भारत में खाद्य तेलों की सप्लाई प्रभावित हुई है और इससे तेलों के दाम बढ़े हैं. उपभोक्ताओं को इसके लिए पहले की तुलना में अधिक जेब ढीली करनी पड़ रही है, लेकिन किसानों में खुशी है.

किसानों की खुशी की वजह है घरेलू बाजार में तिलहन के रेट बढ़े हैं. विदेशी तेल की सप्लाई गिरते ही घरेलू बाजार में देसी तेलों और तिलहन की मांग में बड़ा उछाल है. इसमें सबसे अधिक फायदा सरसों को हुआ है जिसका इस्तेमाल खाने में बहुत अधिक होता है. भारत में इसकी खेती भी बडे़ पैमाने पर होती है और देश इस मामले में आत्मनिर्भर है.

तिलहन में सरसों का दबदबा

विदेशी तेलों की सप्लाई गिरते ही देश में सरसों तेल की मांग बढ़ गई जिसका सीधा फायदा किसानों को हो रहा है. तेल मिलों में सरसों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है जिससे सरसों का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP को पार कर गया है. अभी सरसों की कीमत 7000 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि एमएसपी 6200 रुपये निर्धारित है.

ऐसा मौका बहुत कम आता है जब कृषि उत्पाद की कीमत एमएसपी को पार कर जाए क्योंकि किसानों की अक्सर शिकायत रहती है कि उन्हें सरकारी भाव नहीं मिलता. सरसों ने इसमें अपवाद बनकर दिखाया है जिसका सबसे अधिक फायदा राजस्थान जैसे राज्यों को हो रहा है जहां बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती है. जानकार बताते हैं कि अभी रेट और भी अधिक बढ़ सकते हैं क्योंकि जिस तरह की मांग है वैसी सप्लाई नहीं है.

सरसों की रिकॉर्ड पेराई

किसानों ने अपनी सरसों को पहले ही निकाल दिया है और जिनके पास अभी माल बचा है, उन्हें बहुत अच्छा रेट मिलने की गुंजाइश है. बाकी तेलों के दाम भी बढ़ने वाले हैं. बाकी घरेलू तिलहनों में तिल, रेपसीड, सोयाबीन, चावल की भूसी (राइस ब्रान) आदि शामिल हैं जिनके भाव तेजी से बढ़ रहे हैं. इन सभी प्रोडक्ट से खाने का तेल बनाया जाता है जिसका प्रयोग लोग रसोई में करते हैं.

खुशी की बात है कि अप्रैल 2026 में लगभग 16 लाख टन (lt) रेपसीड-सरसों की रिकॉर्ड पेराई हुई, जिससे घरेलू खाद्य तेल की उपलब्धता मजबूत हुई और किसानों को भी अपनी उपज का बेहतर दाम मिला. विशेषज्ञ बताते हैं कि मौजूदा रुझान से किसानों की आय बढ़ने से उन्हें फायदा हो रहा है, और साथ ही सरकार पर MSP खरीद, भंडारण और रखरखाव से जुड़ा बोझ भी कम हो रहा है.  इस तरह, यह स्थिति किसानों, उद्योग और पूरे खाद्य तेल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए काफी सकारात्मक साबित हो रही है.

सरसों में भारत का तीसरा स्थान 

भारत रेपसीड-सरसों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसका वैश्विक उत्पादन में 13% से अधिक और देश के घरेलू खाद्य तेल उत्पादन में लगभग 36% हिस्सा है. देश का कुल उत्पादन 11.5 से 12.6 मिलियन टन के बीच है, जिसकी खेती लगभग 8.6 से 9.2 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है.

2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि देश में सरसों का कुल उत्पादन 12.61 मिलियन टन से अधिक रहा जबकि बुवाई का क्षेत्र 8.63 मिलियन हेक्टेयर था. सरसों की औसत उपज 1,461 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही है. 

सर्दियों के महीनों (सितंबर से मार्च) के दौरान रबी की फसल के रूप में इसे उगाया जाता है. भारत के 24 राज्यों में सरसों की खेती की जाती है, लेकिन इसका उत्पादन मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में केंद्रित है, जैसे राजस्थान अव्वल राज्य है जिसका देश के कुल सरसों उत्पादन में लगभग 40% से 45% हिस्सा है. 

मध्य प्रदेश दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है जिसका राष्ट्रीय उत्पादन में 13% से ज्यादा योगदान है. उत्तर प्रदेश और हरियाणा घरेलू आपूर्ति में प्रमुख रोल निभारते हैं. बाकी प्रमुख राज्यों में पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़ भी अच्छी-खासी मात्रा में सरसों का उत्पादन करते हैं. 

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