नमी की कमी और पछिया हवा से बचाएं आम का मंजरआम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की उम्मीद और शान है. लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह से मौसम बदल रहा है, उसने बागवानों की रातों की नींद उड़ा दी है. पहले एक तय समय पर मंजर (फूल) आते थे, लेकिन अब जनवरी-फरवरी की गर्मी और अचानक गिरता तापमान गन्ने की तरह आम की फसल को भी अनिश्चित बना रहा है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, बिहार के प्लांट पैथोलॉजी विभाग के हेड, डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, जब तापमान 10 से 30 डिग्री के बीच स्थिर रहता है, तभी फूल स्वस्थ रहते हैं. मगर अब कभी दोपहर में चिलचिलाती धूप होती है तो कभी रात में कड़ाके की ठंड, जिससे मंजर समय से पहले पककर झड़ने लगते हैं. यह जलवायु परिवर्तन "मौसम के आम" को पूरी तरह बदल रहा है. अगर किसान भाई वक्त रहते अपनी तकनीक नहीं बदलेंगे, तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जाएगा. अब पुरानी लकीर पीटने के बजाय हमें वैज्ञानिक समाधानों को अपनाना होगा ताकि आम की मिठास और किसान की जेब दोनों सलामत रहें.
डॉ. एस. के. सिंह ने बताया कि अगर हम पिछले दो सालों के मौसम पर गौर करें, तो भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. साल 2025 में फरवरी की शुरुआत में ही गर्मी बढ़ गई थी, लेकिन फिर अचानक ठंड लौट आई. वहीं 2026 में फरवरी का महीना काफी ठंडा रहा है, जिससे मंजर आने में थोड़ी देरी देखी जा रही है. डॉ. सिंह बताते हैं कि देर से आना हमेशा बुरा नहीं होता, बल्कि यह फूलों की बेहतर क्वालिटी और लंबे समय तक परागण के लिए अच्छा मौका भी हो सकता है. जब तापमान स्थिर रहता है, तो फूल ज्यादा मजबूत होते हैं और फल टिकने की संभावना बढ़ जाती है. किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि इस ठंडे मौसम का फायदा उठाकर बागों की सही देखरेख करनी चाहिए. सही समय पर हल्का पानी और पोषण देकर हम इस देरी को एक बंपर पैदावार में बदल सकते हैं, बशर्ते हम मौसम के हर बदलते मिजाज पर अपनी नजर बनाए रखें.
आम के फूलों के लिए हवा में 60 से 80 फीसदी नमी होना सबसे अच्छा माना जाता है. लेकिन बिहार में अक्सर सुबह के समय नमी 95 फीसदी पार कर जाती है, जिससे 'एन्थ्रेक्नोज' और पाउडरी मिल्ड्यू' जैसी फफूंद वाली बीमारियां पनपने लगती हैं. इसके ठीक उलट, दोपहर में हवा इतनी शुष्क हो जाती है कि पराग-कण सूखने लगते हैं. इसके ऊपर से चलने वाली तेज पछिया हवा आग में घी का काम करती है; यह न केवल फूलों को झाड़ देती है बल्कि छोटे-छोटे फलों-टिकोलों को भी गिरा देती है. डॉ. एस. के. सिंह की सलाह है कि इस दौरान बागों में नमी बनाए रखना बहुत जरूरी है हवा और नमी के इस असंतुलन को समझकर ही हम अपनी फसल को बर्बाद होने से बचा सकते हैं और बेहतर फल-स्थापन सुनिश्चित कर सकते हैं.
बदलते मौसम में मिट्टी की नमी को बचाकर रखना सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए 'मल्चिंग' सबसे बेहतर विकल्प है. इसके लिए गन्ने की सूखी पत्तियां, पुआल या सूखी घास को पेड़ों के नीचे बिछा दें. इससे जमीन का तापमान स्थिर रहता है और पानी भाप बनकर जल्दी नहीं उड़ता. डॉ. सिंह का कहना है कि जहां संभव हो, वहां ड्रिप या स्प्रिंकलर का इस्तेमाल करें. इससे "कम पानी—ज्यादा असर" मिलता है. फरवरी और मार्च के महीने में जब बारिश कम होती है, तब मिट्टी में पानी की कमी होने से फूल जल्दी सूखकर गिरने लगते हैं. मल्चिंग तकनीक न केवल पानी बचाती है बल्कि मिट्टी के मित्र जीवाणुओं को भी सक्रिय रखती है. इस सरल और सस्ती तकनीक को अपनाकर आप अपने बाग को लू और सूखे के प्रभाव से काफी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं, जिससे फलों का आकार और चमक दोनों ही शानदार बनी रहती है. आम के फूलों को ताकत देने के लिए सिर्फ पानी काफी नहीं है, उन्हें 'सूक्ष्म-पोषक तत्वों' की भी जरूरत होती है.
डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार, मंजर आने के दौरान बोरॉन और जिंक का छिड़काव स्प्रे करने से फूलों की उम्र बढ़ती है और परागण की प्रक्रिया सफल होती है. साथ ही, जब बहुत ज्यादा नमी हो, तो बिना वजह कीटनाशकों का छिड़काव न करें, क्योंकि इससे परागण करने वाली मधुमक्खियां मर जाती हैं जो परागण के लिए जरूरी हैं. सही दवा, सही मात्रा और सही समय ही आपकी कामयाबी का असली फॉर्मूला है. डॉ. एस. के. सिंह का मानना है कि कि अगर किसान मौसम की भविष्यवाणी के हिसाब से अपनी सिंचाई और खाद की योजना बनाएंगे, तो नुकसान को न्यूनतम किया जा सकता है. बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन विज्ञान के साथ चलकर हम इस चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं. आम के बागवानों को अब 'क्लाइमेट-स्मार्ट' प्रबंधन की ओर बढ़ना होगा. मल्चिंग, विंडब्रेक और सही समय पर पोषण जैसे छोटे-छोटे कदम उठाकर हम न केवल अपनी आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि बिहार के आमों की खुशबू को पूरी दुनिया में बरकरार रख सकते हैं. आने वाला समय जागरूक किसान का है जो मौसम से लड़ता नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर चलता है.
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