
मॉनसून से खरीफ बुवाई पर असर (AI Image)कमजोर मॉनसून खाद्य महंगाई के लिए बड़ा जोखिम बनकर उभरा है. उपभोक्ता और थोक महंगाई के ताजा आंकड़ों ने आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका को मजबूत किया है. जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खाद्य महंगाई बढ़कर 5.32 प्रतिशत पर पहुंच गई. यह मई में लगभग 5 प्रतिशत और जनवरी में करीब 2 प्रतिशत थी. वहीं, 14 जुलाई को जारी थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आंकड़ों के अनुसार, जून में थोक खाद्य महंगाई बढ़कर करीब 5.5 प्रतिशत हो गई, जो मई में 3.6 प्रतिशत थी.

धान, दलहन और तिलहन की बुवाई का रकबा घटने से आने वाले समय में खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. इसके साथ ही अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा बढ़े तनाव के कारण पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ी है, जिससे उर्वरकों की कीमतें बढ़ने और किसानों की लागत बढ़ने की आशंका भी जताई गई है.
5 जुलाई तक के खरीफ बुवाई आंकड़ों की समीक्षा से पता चलता है कि पिछले साल की समान अवधि की तुलना में धान, दलहन और तिलहन का रकबा काफी कम रहा है. चूंकि खरीफ की अधिकांश बुवाई जुलाई में होती है, इसलिए इस महत्वपूर्ण महीने में धीमी रफ्तार फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती है और खाद्य महंगाई की चिंता बढ़ा सकती है.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस खरीफ सीजन में तिलहन की बुवाई में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जहां रकबा 43 लाख हेक्टेयर कम रहा. इसके बाद कपास की बुवाई में करीब 19 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई. देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य गुजरात और महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, मौजूदा मॉनसून सीजन में गुजरात में 22 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 5 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है.
खरीफ फसलों की कुल बुवाई में गिरावट के बावजूद गन्ने का रकबा लगातार बढ़ रहा है. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018-19 में गन्ने का रकबा 51 लाख हेक्टेयर था, जो लगातार बढ़ते हुए अब 57 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गया है. गन्ने के रकबे के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है और कुल गन्ना क्षेत्रफल में उसकी हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत है. महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर है.
गन्ना इथेनॉल उत्पादन के प्रमुख कच्चे माल में शामिल है और वर्ष 2019-20 के बाद से इथेनॉल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है. भारत ने वर्ष 2001 में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का पायलट कार्यक्रम शुरू किया था. हालांकि, वर्ष 2014 तक इथेनॉल मिश्रण करीब 1.5 प्रतिशत पर ही सीमित रहा. इसके बाद यह बढ़कर 2021-22 में 10 प्रतिशत और 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गया.

गन्ने के अलावा मक्का भी इथेनॉल उत्पादन का प्रमुख फीडस्टॉक है और कुल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत है. इसके अलावा शीरा (मोलासेस) भी इथेनॉल उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है. गन्ने को अधिक पानी की जरूरत वाली फसल माना जाता है, इसके बावजूद किसानों का इसकी ओर लगातार रुझान बढ़ना इस बात का संकेत है कि यह उनके लिए अब भी लाभकारी विकल्प बनी हुई है. (पीयूष अग्रवाल और मयंक मिश्रा की रिपोर्ट)
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today