उंझा जीरा पर विवाद, क्या सिर्फ मंडी की पहचान से मिल सकता है GI Tag?

उंझा जीरा पर विवाद, क्या सिर्फ मंडी की पहचान से मिल सकता है GI Tag?

'उंझा जीरा' के GI टैग को लेकर सवाल उठने लगे हैं. राजस्थान के कृषि विशेषज्ञ ने इसकी वैज्ञानिक और कानूनी समीक्षा की मांग की है. उनका कहना है कि GI टैग किसी व्यापारिक केंद्र की पहचान नहीं, बल्कि उत्पाद की भौगोलिक विशेषताओं पर आधारित होना चाहिए. इस मामले में GI पंजीकरण के आधार पर जांच की मांग की गई है.

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उंझा जीरा पर विवाद, क्या सिर्फ मंडी की पहचान से मिल सकता है GI Tag?'उंझा जीरा' के GI टैग पर उठे सवाल

गुजरात के उंझा से जुड़े प्रसिद्ध 'उंझा जीरा' (Unjha Jeera) के भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं. राजस्थान के कृषि क्षेत्र से जुड़े एक जानकार ने भारतीय भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री (Geographical Indications Registry), चेन्नई को पत्र लिखकर इस GI पंजीकरण की वैज्ञानिक और कानूनी जांच करने की मांग की है. उनका कहना है कि किसी उत्पाद को GI टैग तभी मिलना चाहिए, जब उसकी खास पहचान और गुणवत्ता किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पैदा होने से जुड़ी हो.

South Asia Biotechnology Centre ने उठाई आवाज

इस मामले में "Unjha Jeera" (GI No. 1289) के पंजीकरण को लेकर राजस्थान के कृषि एवं मसाला क्षेत्र से जुड़े कुछ विशेषज्ञों और हितधारकों ने आपत्ति दर्ज कराई है. खास तौर से South Asia Biotechnology Centre (SABC) ने इसके वैज्ञानिक और कानूनी आधार पर सवाल उठाते हुए GI पंजीकरण की समीक्षा की मांग की है. संस्था का कहना है कि ऊंझा (गुजरात) देश के प्रमुख जीरा व्यापार और एग्रीगेशन केंद्रों में से एक है, लेकिन वहां बिकने वाला अधिकांश जीरा राजस्थान समेत अन्य राज्यों से आता है. विरोध करने वाले पक्ष का तर्क है कि GI टैग किसी बाजार या व्यापारिक केंद्र की प्रसिद्धि के आधार पर नहीं, बल्कि किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में उगाए  जाने और खास गुणवत्ता, पहचान और विशेषताओं के आधार पर दिया जाना चाहिए. उन्होंने GI अधिनियम, 1999 के प्रावधानों का हवाला देते हुए "Unjha Jeera" के पंजीकरण की वैज्ञानिक और कानूनी समीक्षा की मांग उठाई है.

उंझा जीरा को 2004 में मिला था GI पंजीकरण

जानकारी के मुताबिक, 'उंझा जीरा' को GI नंबर 1289 के तहत रजिस्टर किया गया है. यह पंजीकरण कृषि उपज बाजार समिति (APMC), उंझा के नाम से किया गया है. यह उत्पाद मसालों की श्रेणी यानी क्लास 30 (Spices) के तहत दर्ज है. GI रजिस्ट्री के प्रमाण पत्र के अनुसार, इसका पंजीकरण 14 जून 2004 को हुआ था और प्रमाण पत्र बाद में 28 मार्च 2026 को जारी किया गया.

GI टैग किसी भी उत्पाद की खास पहचान को कानूनी सुरक्षा देता है. इसके तहत किसी खास क्षेत्र में बनने वाले उत्पाद की गुणवत्ता, प्रसिद्धि और विशेषताओं को उस क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है.

क्या सिर्फ मंडी की पहचान से मिल सकता है GI टैग?

पत्र में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया गया है कि क्या उंझा की व्यापारिक पहचान ही 'उंझा जीरा' को GI टैग देने के लिए पर्याप्त आधार है. जानकारों का कहना है कि उंझा देश के सबसे बड़े जीरा व्यापार केंद्रों में से एक है, जहां बड़ी मात्रा में जीरे की खरीद, बिक्री, छंटाई और पैकिंग होती है.

हालांकि, उनका तर्क है कि GI टैग किसी बाजार या व्यापारिक केंद्र की प्रसिद्धि के आधार पर नहीं दिया जाता, बल्कि यह उस उत्पाद की उन विशेषताओं से जुड़ा होता है, जो किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादन के कारण आती हैं.

राजस्थान से आने वाले जीरे को लेकर उठे सवाल

पत्र में यह भी कहा गया है कि उंझा मंडी में आने वाला जीरा केवल गुजरात के किसी एक क्षेत्र से नहीं आता, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा राजस्थान के कई जिलों और देश के अन्य क्षेत्रों से भी पहुंचता है.

राजस्थान भारत में जीरे का एक प्रमुख उत्पादक राज्य है. यहां के कई जिलों में बड़े पैमाने पर जीरे की खेती होती है. ऐसे में जानकारों ने सवाल उठाया है कि अगर उंझा की पहचान मुख्य रूप से जीरे की खरीद और व्यापार केंद्र के रूप में बनी है, तो क्या इसे वहां उत्पादित जीरे की विशेष गुणवत्ता के रूप में माना जा सकता है?

GI टैग के नियमों के तहत जांच की मांग

विशेषज्ञ ने अपने पत्र में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 का हवाला देते हुए कहा है कि GI टैग के लिए यह साबित होना जरूरी है कि किसी उत्पाद की गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषता उस निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी हुई है.

उनका कहना है कि GI टैग का उद्देश्य किसी क्षेत्र विशेष में पैदा होने वाले उत्पादों की पहचान और किसानों को लाभ पहुंचाना है, लेकिन केवल किसी व्यापारिक केंद्र की लोकप्रियता के आधार पर किसी उत्पाद को GI सुरक्षा देना नियमों की मूल भावना पर सवाल खड़े कर सकता है.

किसानों और मसाला उद्योग पर पड़ सकता है असर

जीरे की खेती और व्यापार से जुड़े किसानों और कारोबारियों के लिए GI टैग काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. किसी उत्पाद को GI पहचान मिलने से उसकी बाजार में अलग पहचान बनती है और कई बार बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ती है.

हालांकि, इस मामले में उठे सवालों के बाद अब यह चर्चा तेज हो गई है कि GI टैग देने की प्रक्रिया में उत्पाद की वास्तविक भौगोलिक पहचान और उत्पादन क्षेत्र की भूमिका को और स्पष्ट तरीके से देखा जाना चाहिए.

आगे होगी GI पंजीकरण की समीक्षा?

अब सभी की नजरें भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री पर हैं कि इस मामले में आगे क्या कदम उठाया जाता है. यदि समीक्षा होती है, तो इसमें यह जांच की जा सकती है कि 'उंझा जीरा' की पहचान वास्तव में उंझा क्षेत्र में उत्पादित जीरे की विशेषताओं से जुड़ी है या फिर यह केवल एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में बनी प्रतिष्ठा का परिणाम है.

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