
इस सीजन में कश्मीर में केसर की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं. लेकिन इस बढ़ी कीमत का फायदा भी उत्पादकों और किसानों को नहीं मिल पा रहा है. उत्पादन में भारी गिरावट के चलते किसानों, उत्पादकों और उद्योग से जुड़े लोग इस बढ़ी हुई कीमतों का फायदा पाने में असफल हैं. केसर उगाने वालों का कहना है कि ऊंची कीमतों के बावजूद कम पैदावार ने मुनाफे की संभावनाओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया है.
किसानों के अनुसार, इस साल 10 ग्राम जीआई-टैग्ड कश्मीरी केसर की कीमत करीब 4,000 रुपये तक पहुंच गई है, जो बाजार में तेज उछाल को दर्शाती है. हालांकि उत्पादन में आई भारी गिरावट के कारण कीमतों में बढ़ोतरी का असर काफी हद तक बेअसर हो गया है. ऑल जम्मू एंड कश्मीर केसर ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वानी ने बिजनेसलाइन से बातचीत में कहा कि कीमतें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन उत्पादन में तेज गिरावट दर्ज की गई है. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में केसर का उत्पादन लगभग 75 प्रतिशत तक घट चुका है, जो दशकों पहले करीब 15 टन था और हाल के सीजन में सिमटकर लगभग एक टन के आसपास रह गया है.
किसानों ने उत्पादन में इस गिरावट के लिए मुख्य रूप से बदलते जलवायु पैटर्न को जिम्मेदार ठहराया है. खासकर सर्दियों के मौसम में लंबे समय तक सूखा रहने से केसर की फसल के विकास चक्र पर प्रतिकूल असर पड़ा है. वानी के मुताबिक, पिछली ठंड में पर्याप्त बारिश न होने के कारण मिट्टी में नमी की भारी कमी रही, जिससे केसर के कॉर्म का विकास ठीक से नहीं हो सका. आधिकारिक आंकड़े भी जम्मू और कश्मीर में केसर उत्पादन में लंबे समय से जारी गिरावट की पुष्टि करते हैं.
वर्ष 2010-11 में केसर का उत्पादन करीब 8 टन था, वहीं 2023-24 में यह घटकर 2.6 टन रह गया, यानी कुल मिलाकर लगभग 67.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 2022-23 से 2023-24 के बीच उत्पादन में करीब 4 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी हुई है. इसके बावजूद, उत्पादकों का कहना है कि मौजूदा उत्पादन स्तर पहले के मुकाबले काफी नीचे है और यह बढ़ती इनपुट लागत और घटते खेती क्षेत्र की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है. उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर सिंचाई ढांचे को मजबूत नहीं किया गया और जलवायु-सहनीय खेती के तरीकों को नहीं अपनाया गया, तो कश्मीर का केसर सेक्टर आने वाले समय में और दबाव में आ सकता है.
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