
पिछले साल सरसों के उत्पादन में 4 प्रतिशत से अधिक की गिरावट के बाद चालू फसल वर्ष 2025-26 में उत्पादन में कम से कम 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है. इसकी वजह सरसों के रकबे में बढ़ोतरी और अब तक अनुकूल बना हुआ मौसम है. हालांकि, उत्तर-पश्चिम भारत में अगले कुछ दिनों के दौरान बारिश और ओलावृष्टि की संभावना किसानों के लिए चिंता का कारण बन सकती है.
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष सरसों का रकबा 2024-25 के 86.57 लाख हेक्टेयर की तुलना में 3.2 प्रतिशत बढ़कर 89.36 लाख हेक्टेयर हो गया है. पिछले वर्ष सरसों का कुल उत्पादन 126.67 लाख टन रहा था, जबकि सरकार ने 2025-26 के लिए 139 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि पश्चिमी विक्षोभ के असर से 26 और 27 जनवरी को जम्मू-कश्मीर में, जबकि 27 जनवरी को हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में कुछ स्थानों पर बारिश और ओलावृष्टि हो सकती है. इससे खड़ी फसल को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी हुई है.
आईएमडी के अनुसार, 27 जनवरी को पंजाब और हरियाणा में कहीं-कहीं हल्की से मध्यम बारिश, गरज-चमक और 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं, जो कुछ स्थानों पर 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती हैं. वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी इसी दिन गरज के साथ बारिश और तेज हवाओं की संभावना जताई गई है. 27 और 28 जनवरी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही मौसम रह सकता है. हालांकि, फिलहाल फसल की स्थिति को लेकर राहत की खबर है.
भरतपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रेपसीड-मस्टर्ड रिसर्च के पूर्व निदेशक पी.के. राय ने कहा कि सरसों की फसल लगभग सभी इलाकों में अच्छी स्थिति में है और अब तक पाले की कोई सूचना नहीं मिली है, जो उत्पादन के लिहाज से सकारात्मक संकेत है. वर्तमान में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटिक स्ट्रेस मैनेजमेंट (NIBSM) के निदेशक राय ने बताया कि छत्तीसगढ़ में सरसों के रकबे को मौजूदा करीब 30,000 हेक्टेयर से बढ़ाकर एक लाख हेक्टेयर तक ले जाने की योजना पर काम किया जा रहा है.
राज्यों के स्तर पर देखें तो पारंपरिक सरसों उत्पादक राजस्थान में रकबा 1 प्रतिशत बढ़कर 35.35 लाख हेक्टेयर हो गया है. मध्य प्रदेश में इसमें 41 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है और रकबा 11.79 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है. उत्तर प्रदेश में सरसों का रकबा 4 प्रतिशत बढ़कर 16.99 लाख हेक्टेयर हो गया है. हालांकि राजस्थान का रकबा अभी भी 2022-23 के रिकॉर्ड 39.37 लाख हेक्टेयर से नीचे है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह 2015-16 के 5.93 लाख हेक्टेयर के मुकाबले लगभग तीन गुना बढ़ गया है.
विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के सहयोग से चलाए गए विशेष कार्यक्रमों ने इस विस्तार में अहम भूमिका निभाई है. वहीं दूसरी ओर, उत्तर-पूर्वी राज्यों, खासकर असम और झारखंड में सरसों के रकबे में आई कमी सरकार के लिए चिंता का विषय बन सकती है, क्योंकि खाद्य तेल मिशन का तीसरा सीजन जारी है. विशेषज्ञों का मानना है कि नवंबर में हुई बारिश के कारण झारखंड में समय पर बुआई नहीं हो पाई, जिससे फसल को अधिक तापमान और कीट प्रकोप का खतरा बढ़ गया.
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