देश में 30 फीसदी से अधिक भूमि खराब हो गई है. मिट्टी की गिरती उर्वरा शक्ति के बीच 960 लाख हेक्टेयर भूमि खराब होने के आंकड़े ने चौंका दिया है. भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के अनुसार मिट्टी में मौजूद जैविक तत्वों में तेजी से गिरावट देखी जा रही है. जबकि, पानी के तेज बहाव और हवा के चलते हर साल कई टन टॉप सॉइल नष्ट हो रही है. वैज्ञानिकों ने मिट्टी के स्वास्थ्य को बरकारर रखने के लिए केमिकल का इस्तेमाल नहीं करने और क्षरण रोकने का आह्वान किया है. जबकि, संस्थान के देशभर में स्थापित 8 केंद्रों पर मिट्टी के स्वास्थ्य देखभाल, आकलन और सुधार के लिए देश के 8 केंद्रों पर कोर रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया गया है.
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुछ सप्ताह पहले मृदा दिवस पर आयोजित समारोह में कहा था कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति तेज से गिर रही है और लगभग 30 फीसदी भूमि खराब हो गई है. उन्होंने चिंता जताई थी कि कहीं धरती आने वाले समय में बंजर न हो जाए और फसलों की पैदावार बंद न हो जाए. उन्होंने कहा था कि आने वाली पीढ़ियों के धरती को बचाए रखना जरूरी है और इसके लिए नेचुरल फार्मिंग के साथ ऑर्गनिक फार्मिंग को अपनाना है.
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR–IISWC) देहरादून केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एम. मुरुगानंदम और निदेशक डॉ. एम. मधु ने भूमि के खराब स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने विश्व मृदा दिवस 2024 के मौके पर स्थायी भविष्य के लिए मृदा स्वास्थ्य का संवर्धन पर जोर दिया. ताकि वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा, जलवायु लचीलापन और सतत विकास पक्का किया जा सके. इस वर्ष की थीम "मृदा की देखभाल: मापें, मॉनिटर करें, प्रबंधित करें, के आधार पर लोगों को जागरूक करने का संकल्प लिया गया है.
उन्होंने कहा कि भारत विश्व के कुल भूमि क्षेत्र का 2.4 फीसदी है. यह 17.7 फीसदी वैश्विक जनसंख्या और 15 फीसदी पशुधन का पोषण करता है. हालांकि, देश की मृदा तेज कृषि, शहरीकरण, वन कटाई और जलवायु परिवर्तन के चलते अत्यधिक दबाव में है. डॉ. एम. मुरुगानंदम ने कहा कि इसरो (ISRO) की हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि भारत की 960 लाख हेक्टेयर भूमि खराब हो चुकी है. इतना ही नहीं हर साल 5.3 अरब टन टॉपसॉइल जल और वायु क्षरण के चलते नष्ट हो जाती है.
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मिट्टी में जैविक कार्बन यानी एसओसी (Soil Organic Carbon-SOC) की मात्रा तेजी से घट रही है. एसओसी मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर रखता है. देश की मिट्टी में 0.5 फीसदी से कम जैविक कार्बन होता है, जबकि आदर्श स्तर 1-2 फीसदी है. इस गिरावट से मिट्टी की उर्वरता पर विपरीत असर हो रहा है. पोषक तत्वों की संतुलन तेजी से बदल रहा है, जिसके चलते एनपीके अनुपात और सूक्ष्म पोषक तत्वों में भी गिरावट देखी जा रहा है. मिट्टी की यह स्थिति फसल की पैदावार को और खराब कर रही है.
डॉ. एम. मुरुगानंदम ने कहा कि भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR–IISWC) मुख्यालय और देशभर में अपने 8 अनुसंधान केंद्रों के साथ हाल ही में एक कोर रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया है. इसका उद्देश्य प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और मृदा स्वास्थ्य का आकलन करना है. इससे मिट्टी में हो रहे बदलावों की पहचान कर सुधार के लिए उपायों को लागू करना है. उन्होंने कहा कि मिट्टी को खराब होने से बचाने के लिए सरकार मृदा स्वास्थ्य को बहाल करने और संरक्षित करने के लिए कई पहल की हैं. इसमें मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, परम्परागत कृषि विकास योजना, प्राकृतिक खेती, जैविक कचरा रिसाइकिल प्रोजेक्ट समेत कई परियोजनाएं चलाई जा रही हैं.
भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR–IISWC) देहरादून के निदेशक डॉ. एम. मधु ने कहा कि देश मिट्टी लाखों लोगों की आजीविका का आधार है. इसके संरक्षण और इसके स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं. उन्होंने बताया कि हमारा केंद्र सक्रिय रूप से मिट्टी में नमी संरक्षण, फसल चक्रीकरण, जैविक संशोधन और स्थान विशिष्ट मृदा और जल संरक्षण उपायों को बढ़ावा दे रहा है. रिसर्चर्स को मृदा स्वास्थ्य की उभरती चुनौतियों का समाधान करने के लिए इनोवेशन करना होगा. उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ और उत्पादक मृदा देने के लिए साथ मिलकर हम एक लचीला और समृद्ध भविष्य बना सकते हैं.
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