डिब्रूगढ़ के चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं की कहानीअसम के डिब्रूगढ़ के जामिरा इलाके में सुबह का मतलब सिर्फ सूरज निकलना नहीं, बल्कि एक और मेहनत भरे दिन की शुरुआत है. यहां चाय बागानों में काम करने वाली महिलाएं रोजाना करीब 4 बजे उठ जाती हैं. घर की सफाई, बच्चों के लिए खाना, पानी भरना और बाकी घरेलू काम निपटाने के बाद वे बिना रुके काम पर निकलने की तैयारी करती हैं. करीब 7 बजे तक हर हाल में बागान पहुंचना होता है. एक महिला कहती है, “यहां सूरज जल्दी निकलता है और अंधेरा भी जल्दी हो जाता है, इसलिए देर करने का मतलब है काम का नुकसान.” इन महिलाओं के लिए सुबह का समय सबसे ज्यादा व्यस्त होता है, क्योंकि उन्हें घर और काम दोनों की जिम्मेदारी एक साथ निभानी होती है.
चाय बागान के श्रमिकों के घरों में झांकने पर गरीबी की एक सच्ची तस्वीर सामने आती है. छोटे-छोटे कच्चे या टीन की छत वाले घर, टूटी हुई चीजें और सीमित संसाधन. एक घर में चाय पत्ती रखने का डिब्बा टूटा हुआ है, गिलास बीच से चटक चुके हैं और छत से लटका पुराना पंखा धूल से भरा है. बिजली के तार खुले हुए हैं, जो किसी भी समय खतरा बन सकते हैं. यहीं पर मिट्टी के चूल्हे पर सुबह की चाय बनती है. लकड़ी, कागज और सूखे पत्तों से आग जलाई जाती है. सुमारी मेधा कहती हैं, “हमारी जिंदगी बस काम और घर के बीच ही है. बचत के लिए कुछ बचता ही नहीं.”
चाय बागान में काम का मतलब है लगातार झुककर पत्तियां तोड़ना. सिर पर बंधी टोकरी में जैसे-जैसे पत्तियां भरती जाती हैं, उसका वजन 15 से 20 किलो तक पहुंच जाता है. लेकिन काम के दौरान कोई वजन नहीं गिनता. एक महिला बताती हैं, “हम बस पत्तियां तोड़ते जाते हैं, ये नहीं सोचते कि कितना वजन हो गया.” दोपहर करीब 12 बजे तक पत्तियों का वजन किया जाता है.
मशीन से तौलकर उन्हें ट्रक में भरकर फैक्ट्री भेज दिया जाता है. इसके बाद थोड़ी देर का लंच ब्रेक मिलता है. लंच भी यहां अलग अंदाज में होता है. महिलाएं छाते को चारों तरफ से ढाल की तरह इस्तेमाल करती हैं ताकि खाना सुरक्षित रहे. एक महिला बताती हैं, “कीड़े-मकोड़े और बारिश से बचाने के लिए ऐसा करना पड़ता है.”
इस पूरी मेहनत के बदले मिलने वाली मजदूरी सबसे बड़ा सवाल है. ज्यादातर श्रमिकों को 8 घंटे के काम के लिए रोजाना करीब 250 रुपये मिलते हैं. रीता कहती हैं, “250 रुपये में क्या होता है? बच्चों को पढ़ाएं या घर चलाएं?” रानी इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, “30 रुपये बढ़ाने की बात हो रही है, लेकिन इससे कुछ नहीं बदलेगा. हमने 500 रुपये की मांग की है.” महिलाओं का कहना है कि महंगाई के इस दौर में यह मजदूरी बेहद कम है. चावल, दाल, सब्जी और बच्चों की पढ़ाई - हर खर्च बढ़ चुका है. एक महिला बताती हैं, “150 रुपये तो सिर्फ बच्चे के आने-जाने में लग जाते हैं. बाकी में क्या बचेगा?”
कम मजदूरी का सीधा असर कर्ज के रूप में दिखता है. कई परिवारों को अपना गुजारा चलाने के लिए उधार लेना पड़ता है. संगीता दास बताती हैं, “जो कमाती हूं, उससे घर नहीं चलता. कर्ज लेना पड़ता है. अभी करीब 10 हजार रुपये का कर्ज है.”
उनके पति अब इस दुनिया में नहीं हैं और पूरे घर की जिम्मेदारी उन्हीं पर है. वह कहती हैं, “अगर मैनेजर से उधार लेते हैं, तो सैलरी से पैसे कट जाते हैं. बाहर से लें, तो ब्याज देना पड़ता है.” इस चक्र में फंसे कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी कमाई महीने के अंत तक खत्म हो जाती है.
इन तमाम मुश्किलों के बावजूद हर महिला के चेहरे पर एक उम्मीद साफ दिखती है - अपने बच्चों का बेहतर भविष्य. सुमारी कहती हैं, “हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करें. वो बागान में न आएं.” लेकिन यहां भी चुनौतियां हैं. स्कूल तो मौजूद हैं, लेकिन शिक्षकों की भारी कमी है. कई जगह सिर्फ दो शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहे हैं. महिलाओं का कहना है कि पढ़ाई की गुणवत्ता कमजोर है, जिसके कारण कई बच्चे आगे बढ़ने के बजाय फिर उसी बागान में लौट आते हैं.
कुछ श्रमिक मानते हैं कि उन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा मिला है. राशन, आर्थिक सहायता और जमीन के पट्टे को लेकर प्रक्रिया शुरू हुई है. संगीता कहती हैं, “सरकार से कुछ मदद मिली है. पैसे भी मिले और घर का सर्वे भी हुआ.” लेकिन इसके बावजूद मजदूरी, स्थायी जमीन और सामाजिक पहचान जैसे मुद्दे अब भी अधूरे हैं.
एक महिला ने कहा, “चुनाव के समय नेता आते हैं, लेकिन बाद में कोई नहीं आता.”
दोपहर के समय जब महिलाएं कुछ देर आराम करती हैं तो माहौल थोड़ा बदल जाता है. कोई गीत गुनगुनाता है, कोई हंसी-मजाक करता है, कोई आपस में बातें करता है. एक सहकर्मी मजाक में कहती है, “आज तो तू हीरोइन बन गई,” और सभी हंस पड़ती हैं. ये छोटे-छोटे पल ही हैं, जो दिनभर की थकान के बीच इन महिला श्रमिकों थोड़ी राहत देते हैं.
दोपहर के बाद जब धूप तेज होती है तो महिलाएं फिर से टोकरी लेकर काम में जुट जाती हैं. छाते अब धूप से बचने के लिए खुल जाते हैं. उनकी उंगलियां लगातार पत्तियां तोड़ती रहती हैं. शरीर थकता है, लेकिन काम रुकता नहीं. शाम को जब वे घर लौटती हैं तो दिनभर की मेहनत के बाद भी अगले दिन की चिंता साथ रहती है. फिर भी, इस पूरे संघर्ष के बीच एक चीज सबसे मजबूत है - उम्मीद जब एक महिला पूछती है, “भैया, ये टीवी पर आएगा ना?” इस एक सवाल में उनकी पूरी जिंदगी का सार छिपा है - संघर्ष, उम्मीद और बदलाव का इंतजार.
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