प्याज निर्यात पर सरकार की लचर नीतिभारत के प्याज किसानों के लिए हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं. कभी दुनिया के बाजार में दबदबा रखने वाला भारतीय प्याज आज अपने ही फैसलों की वजह से कमजोर पड़ गया है. आंकड़े बताते हैं कि बांग्लादेश को 46% प्याज निर्यात करने वाला भारत अब सिर्फ 6% पर सिमट गया है, जिससे किसानों की कमाई पर बड़ा असर पड़ा है. महाराष्ट्र के नासिक, मध्य प्रदेश के इंदौर और पश्चिम बंगाल के बॉर्डर इलाकों में किसान इस समय सबसे ज्यादा संकट में हैं. निर्यात घटने से बाजार में प्याज की भरमार हो गई है, जिससे कीमतें गिर गई हैं और किसानों को लागत से भी कम दाम मिल रहे हैं.
प्याज निर्यात में गिरावट के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है, बल्कि कई वजहें एक साथ जिम्मेदार हैं.
किसानों और व्यापारियों का आरोप है कि DGFT (डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड) और NAFED/NCEL की नीतियों ने हालात बिगाड़े हैं. बार-बार निर्यात पर रोक (Export Ban), अचानक Minimum Export Price (MEP) लागू करना और निजी निर्यातकों को हटाकर सरकारी एजेंसियों से निर्यात कराने जैसे फैसलों से बाजार में हलचल पैदा हुई और विदेशी खरीदारों का भरोसा टूट गया.
इसका नतीजा हुआ कि बांग्लादेश, नेपाल और इंडोनेशिया जैसे देशों ने अब चीन और पाकिस्तान से प्याज खरीदना शुरू कर दिया. भारत के परंपरागत बाजार उसके हाथों से निकल गए जबकि नए ग्राहक बनाने और भरोसा कायम करने में कई साल लग जाएंगे.
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भी प्याज निर्यात पर पड़ा है. जानकार बताते हैं कि विदेशों में माल सप्लाई करने वाले कंटेनर का किराया 600 डॉलर से बढ़कर 6500 डॉलर हो गया जिससे निर्यात महंगा हो गया. इससे भारतीय प्याज दुनिया के मार्केट में मुकाबले से बाहर हो गया.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि खराब नीतियों और निर्यात में गिरावट से किसानों और व्यापारियों को करीब 1.2 बिलियन डॉलर (10,000 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ है. यह आंकड़ा 2023 का है जब प्याज निर्यात पर रोक जैसे फैसले अमल में आ रहे थे. तब से लेकर नुकसान का यह आंकड़ा और भी बढ़ गया है.
प्याज निर्यात ठप होने का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ा है. जैसे, मंडियों में प्याज की भरमार हो गई है जिससे कीमतें लगातार गिरती जा रही हैं. ऐसे में किसान मजबूर होकर 600 से 850 रुपये प्रति क्विंटल पर प्याज बेच रहे हैं जबकि उनकी लागत इससे कहीं ज्यादा है. लागत लगभग 2000 रुपये प्रति क्विंटल है और कमाई लगभग आधी रह गई है.
अचानक नीति बदलावों का असर लॉजिस्टिक्स पर भी पड़ा. महदीपुर बॉर्डर (प. बंगाल) पर हजारों टन प्याज फंसकर सड़ गया, निर्यातकों को ट्रांसपोर्ट का पैसा भी नहीं मिला और विदेशी ऑर्डर कैंसल हो गए. इससे भारत की ग्लोबल मार्केट में साख को बड़ा नुकसान पहुंचा है.
नुकसान के कारणों की बात करें तो सरकार ने निर्यात को NAFED और NCEL के माध्यम से कंट्रोल किया, लेकिन इससे एक्सपोर्ट का काम धीमा हो गया, व्यापारियों और किसानों को भुगतान में देरी हुई. साथ ही कागजी काम बढ़ गया और निर्यात पर बढ़ते पेच से निर्यातक बाजार से बाहर हो गए. नतीजा हुआ कि भारत ने अपना पुराना बाजार खो दिया.
सवाल है कि इस बिगड़े हालात को दुरुस्त करने का उपाय क्या है? विशेषज्ञ मानते हैं कि अभी भी स्थिति सुधर सकती है, अगर सरकार स्थिर और स्पष्ट निर्यात नीति बनाए और प्राइवेट व्यापारियों को फिर मौका दे. इसके साथ ही यूरोप और जापान जैसे नए बाजारों पर ध्यान दे. कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चेन मजबूत करे.
यूरोप में प्याज का उत्पादन कम होता है, खासकर सर्दियों में. वहां क्वालिटी और स्पेशल ग्रेड प्याज की मांग ज्यादा रहती है जबकि भारत का प्याज लंबे समय तक स्टोर होने वाला है. ऐसे में भारत अपना रुख बदल कर बांग्लादेश और खाड़ी देशों से हुए नुकसान की भरपाई कर सकता है.
एक्सपर्ट बताते हैं कि यूरोपीय देशों में प्याज की कीमतें आमतौर पर एशियाई बाजार से ज्यादा मिलती हैं. अगर क्वालिटी सही हो तो किसान को बेहतर रेट मिल सकता है और बीते कई साल के घाटे को कुछ महीनों में पाटा जा सकता है.
हालांकि यूरोप के देशों में निर्यात के बहुत सख्त नियम हैं, जैसे क्वालिटी स्टैंडर्ड और पेस्टिसाइड लिमिट. इसके अलावा, साफ-सुथरी पैकिंग और ग्रेडिंग जरूरी है. ये सभी काम तभी हो पाएंगे जब देश में कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चेन मजबूत हो. ऐसे में अगर सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर और क्वालिटी सुधार करे तो यूरोप का बाजार बड़ा मौका बन सकता है.
इसी तरह जापान में प्याज की खेती लायक जमीन बहुत कम है, इसलिए आयात पर निर्भरता ज्यादा है. वहां के लोग हाई क्वालिटी और सुरक्षित खाने की चीजें पसंद करते हैं. किसानों के लिहाज से सोचें तो जापान में प्याज का रेट काफी अच्छा मिलता है जिसे देखते हुए छोटे लेकिन प्रिमियम मार्केट में जगह बन सकती है.
इन सभी बातों पर गौर करते हुए अगर सरकार सही रणनीति बनाए, तो भारत खोया हुआ बाजार वापस पाने के साथ किसानों की आय भी बढ़ा सकता है. अगर सरकार ने इस तरह के नीतिगत सुधार नहीं किए, तो भारत का प्याज वैश्विक बाजार से लगभग बाहर हो सकता है—और इसका खामियाजा सबसे ज्यादा किसान को भुगतना पड़ेगा.
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