नाना पाटेकर का पार्थिव शरीर (Photo: ITGD)गुरुवार को जब पूरे भारत में फिल्म प्रेमी दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर शोक मना रहे थे, तब मध्य महाराष्ट्र के एक गांव ने याद किया कि कैसे उन्होंने दस साल पहले जल संरक्षण परियोजना के लिए पैसे देकर गांव को 'टैंकर-मुक्त' बनने में मदद की थी. पाटेकर (76) का गुरुवार तड़के गोवा स्थित उनके घर पर निधन हो गया.
पाटेकर और साथी मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे द्वारा शुरू किए गए 'नाम फ़ाउंडेशन' ने 2016 में वैजापुर तहसील के गांव ढोंडलगांव को गोद लिया था.
नदी विशेषज्ञ आनंद असोलकर ने बताया कि छत्रपति संभाजीनगर शहर से 57 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में हर साल मॉनसून खत्म होने और दिवाली के करीब आने पर टैंकरों से पानी की सप्लाई की जरूरत पड़ती थी.
निजाम के दौर में यह गांव अपने मीठे नींबू (मौसंबी) के लिए मशहूर था, जिन्हें पास के करंजगांव रेलवे स्टेशन से देश के दूसरे हिस्सों में भेजा जाता था. लेकिन स्थानीय नदी पर बने बैराज गाद (silt) से भर जाने के कारण, अब मीठे नींबू के पेड़ उगाना या साल में एक से ज्यादा फसल लेना मुमकिन नहीं रह गया था.
असोलकर ने PTI को बताया, "नाम फाउंडेशन बनाने के बाद, मकरंद अनासपुरे और नाना पाटेकर ऐसे गांव की तलाश में थे जहां जल संरक्षण परियोजना शुरू की जा सके... मैंने उन्हें ढोंडलगांव के बारे में बताया... वे 2 अक्टूबर 2015 को यहां आए और काम का उद्घाटन किया."
उन्होंने कहा, "वहां 12 बैराज थे और वे पूरी तरह से गाद से भरे हुए थे, इसलिए वहां पानी नहीं रुकता था. ग्रामीणों ने भी काम में योगदान दिया और हमने 4.5 किलोमीटर के हिस्से से गाद हटाई. इससे लगभग 20 करोड़ लीटर पानी जमा करने की क्षमता बनी."
असोलकर ने कहा कि इससे गांव की अर्थव्यवस्था बदल गई.
उन्होंने कहा, "यहां के लगभग 70 प्रतिशत किसान अब साल में दो फसलें उगाते हैं. कुछ तो तीन फसलें भी उगाते हैं. 2016 से लेकर आज तक यह गांव टैंकर-मुक्त रहा है, सिवाय 2018 के कुछ महीनों के जब यहां जबरदस्त सूखा पड़ा था."
स्थानीय कार्यकर्ता राहुल साबले ने कहा कि पानी की उपलब्धता से डेयरी फार्मिंग को भी बढ़ावा मिला. अब इस गांव में रोजाना 10,000 लीटर तक दूध का उत्पादन होता है, जो जिले में सबसे ज्यादा है. दूध के इस कारोबार से लगभग 800 स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला है.
साबले ने कहा, "नाना ने हमारे गांव को गोद लिया और लोगों का हमारे गांव को देखने का नजरिया बदल गया. राजनेताओं ने हमारे गांव के विकास को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया. मुझे यह कहते हुए गर्व होता है कि जब से यह काम पूरा हुआ है, तब से यहां एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है."
गांव के सरपंच भारत अवारे ने कहा कि बार-बार पड़ने वाले सूखे की वजह से स्थानीय लोगों की सोच नकारात्मक हो गई थी. लेकिन NAAM फाउंडेशन के नेतृत्व में चलाए गए जल संरक्षण प्रोजेक्ट ने सब कुछ बदल दिया.
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