
महाराष्ट्र में भयंकर सूखा (AI Image)मॉनसून में इस साल भयंकर सूखा है. मॉनसून खत्म होने तक महाराष्ट्र की जमीन सबसे ज्यादा गीली होनी चाहिए. इस साल राज्य का ज्यादातर हिस्सा सूखा है. अकोला, सोलापुर, वर्धा और वाशिम में, नेशनल ड्रॉट मॉनिटर की हर रीडिंग में गंभीर सूखा या उससे भी बुरा हाल दिख रहा है.
इसकी शुरुआत दक्षिण से हुई. अगस्त के बीच में, सांगली का ज्यादातर हिस्सा गंभीर सूखे की चपेट में आ गया और वहीं बना रहा. एक हफ्ते बाद सतारा का भी यही हाल हुआ. अगस्त के आखिरी हफ्ते तक, दक्षिण में सोलापुर और पूर्व में अकोला, वर्धा और नागपुर में एक साथ गंभीर सूखा पड़ गया. एक रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर के बीच तक वाशिम और बीड के किसान राज्य सरकार से सूखा घोषित करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे.
मॉनिटर के आंकड़े इसकी गंभीरता को दिखाते हैं. 16 सितंबर वाले हफ्ते में महाराष्ट्र का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा असामान्य रूप से सूखा या सूखे की चपेट में था. राज्य का आधे से ज्यादा हिस्सा, यानी 56.5 प्रतिशत, गंभीर सूखे या उससे भी बुरे हालात में था. 2021 से शुरू हुए इसके रिकॉर्ड में सितंबर के बीच का ऐसा कोई और समय नहीं है जो इसके आस-पास भी हो.
राज्य सरकार ने अभी तक यह नहीं बताया है कि सूखा कहां है. मुख्यमंत्री ने 22 सितंबर को कहा कि शनिवार तक एक शुरुआती नोटिस जारी किया जाएगा. उस नोटिस से तय होगा कि राहत कहां भेजी जाएगी.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 22 सितंबर को मुंबई में कैबिनेट की बैठक के बाद पत्रकारों से कहा, "सिर्फ सूखा घोषित करना काफी नहीं है. हमें यह पक्का करना होगा कि सूखे से निपटने के उपाय लागू हों. पहला नोटिफ़िकेशन तीन दिनों में जारी किया जाएगा."

ये आंकड़े इंडिया ड्रॉट मॉनिटर से लिए गए हैं, जिसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गांधीनगर की वॉटर एंड क्लाइमेट लैब चलाती है. हर हफ्ते यह बारिश, नदी के बहाव और मिट्टी की नमी के आधार पर जमीन की स्थिति का आकलन करता है. हर चीज की तुलना उस जगह और साल के उस समय के सामान्य स्तर से की जाती है.
कम स्कोर का मतलब है सूखी जमीन. एक तय सीमा से नीचे होने पर, मॉनिटर जमीन को असामान्य रूप से सूखा बताता है. और नीचे होने पर, इसे गंभीर सूखा कहा जाता है. इसके अपने आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र की ज्यादातर जमीन इन दोनों सीमाओं को पार कर चुकी है.
सबसे ऊपर के स्तर पर मॉनिटर की नेशनल समरी से पता चलता है कि 16 सितंबर वाले हफ्ते में सिर्फ गोवा (94.6%) और आंध्र प्रदेश (92.8%) में ही ज्यादा जमीन असामान्य रूप से सूखी या सूखे की चपेट में थी. इस समरी के मुताबिक, महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 83.5% था.
पूरे भारत में, 52.5% जमीन असामान्य रूप से सूखी या सूखे की चपेट में है. एक महीने पहले यह आंकड़ा 38.9% था.

मॉनिटर के डेटा से पता चलता है कि 19 अगस्त वाले हफ्ते में, राज्य का 14% हिस्सा गंभीर सूखे या उससे भी बुरे हालात में था. 9 सितंबर वाले हफ्ते तक यह आंकड़ा 61.5% हो गया. DIU की कैलकुलेशन के मुताबिक, यह चार गुना से भी अधिक जमीन थी. 16 सितंबर तक इसमें थोड़ी राहत मिली.
सीजन की शुरुआत से ही हालात खराब थे. 24 जून वाले हफ्ते में, राज्य का 79.2% हिस्सा असामान्य रूप से सूखा या सूखे की चपेट में था. मॉनसून के किसी भी हफ्ते में यह हिस्सा 41% से नीचे नहीं गया. DIU के एनालिसिस से पता चलता है कि अब तक के 16 हफ्तों में से 14 हफ्तों में, 2026 का मॉनसून पिछले पांच मॉनसून सीजन के मुकाबले सबसे सूखा रहा.

इस साल का ग्राफ ज्यादातर सीजन के दौरान दूसरे सभी सालों के ग्राफ से ऊपर रहा है. अगस्त के आखिरी हफ्तों में इसमें सबसे तेजी से बढ़ोतरी हुई.
हां, काफी ज्यादा बुरा है. सितंबर 2023 के बीच में, राज्य का 52.7% हिस्सा असामान्य रूप से सूखा या सूखे की चपेट में था. लेकिन DIU के एनालिसिस के मुताबिक, सिर्फ 7% हिस्सा ही गंभीर सूखे या उससे भी बुरे हालात में था. इस साल गंभीर सूखे वाला हिस्सा आठ गुना ज्यादा है.
इसका दायरा भी अधिक बड़ा है. 13 सितंबर 2023 वाले हफ्ते में, किसी भी डिवीजन में 12.9% से ज्यादा जमीन गंभीर सूखे या उससे भी बुरे हालात में नहीं थी. नागपुर डिवीजन में तो ऐसा कोई हिस्सा नहीं था. इस साल, नागपुर में यह आंकड़ा 63.2% है. 2021 से 2025 के बीच सितंबर के मध्य में नागपुर डिवीजन के किसी भी ग्रिड पॉइंट पर गंभीर सूखा नहीं देखा गया.
मॉनिटर के डेटा के DIU एनालिसिस से पता चलता है कि बीड और धाराशिव उन चार जिलों के बाद आते हैं जहां की जमीन का बड़ा हिस्सा गंभीर सूखे की चपेट में है. यहां यह आंकड़ा क्रमशः 92.9 और 90.9 प्रतिशत है. कुल मिलाकर, रैंकिंग के लिए चुने गए 33 जिलों में से 19 जिलों की कम से कम आधी जमीन गंभीर सूखे या उससे भी खराब स्थिति में थी.
यह फैलाव हर हफ्ते साफ दिखता है. एनालिसिस से पता चलता है कि सांगली में लगातार छह हफ्तों तक आधी या उससे ज्यादा जमीन गंभीर सूखे या उससे भी खराब स्थिति में रही, सतारा में पांच हफ्तों तक, और नागपुर, अकोला, वर्धा और सोलापुर में चार हफ्तों तक.
डिवीजन के हिसाब से देखें तो अमरावती की स्थिति सबसे खराब है, जहां 84.8 प्रतिशत जमीन गंभीर सूखे या उससे भी खराब स्थिति में है. इसके बाद छत्रपति संभाजीनगर डिवीजन (जिसमें मराठवाड़ा शामिल है) का नंबर आता है, जहां यह आंकड़ा 65.9 प्रतिशत है. नागपुर 63.2 प्रतिशत और पुणे 57 प्रतिशत पर हैं. कोंकण और नासिक की स्थिति सबसे अच्छी है, जहां यह आंकड़ा क्रमशः 30.4 और 29.4 प्रतिशत है.
काफी हद तक. भारत मौसम विज्ञान विभाग की जिला बारिश रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में 1 जून से 22 सितंबर के बीच 787.2 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य 953.2 मिमी से 17 प्रतिशत कम है. बारिश की कमी वहां सबसे ज्यादा है जहां मॉनिटर के अनुसार सूखा पड़ा है. मराठवाड़ा में बारिश में 37 प्रतिशत और विदर्भ में 28 प्रतिशत की कमी रही. बीड में यह कमी 48 प्रतिशत थी.(दीपू राय की रिपोर्ट)
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