फूलों की खेतीमध्य प्रदेश अब सिर्फ अनाज, मसालों और फल-सब्जी ही नहीं, बल्कि फूलों के उत्पादन में भी तेजी से तरक्की कर रहा है. मध्य प्रदेश अब फूलों के उत्पादन में देश में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है. वित्त वर्ष 2024-25 में प्रदेश के किसानों ने 5 लाख 12 हजार टन से ज्यादा फूलों का उत्पादन किया है, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. मध्यप्रदेश अब सिर्फ गेहूं, सोयाबीन या दलहन की खेती के लिए नहीं जाना जा रहा. अब इस राज्य की पहचान फूलों की खेती से भी बनने लगी है.
गुलाब, गेंदा और जरबेरा की खुशबू अब दिल्ली, मुंबई से होती हुई पेरिस और लंदन तक पहुंच चुकी है. राज्य सरकार की ओर से जारी बयान में बताया गया कि मध्य प्रदेश में महज चार सालों में फूलों की खेती का रकबा 37 हजार हेक्टेयर से बढ़कर करीब 43 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया है. छोटे किसानों के लिए फूल अब मुनाफे की नई फसल बनकर उभर रहे हैं.
राजधानी भोपाल की बरखेड़ा बोदर पंचायत की लक्ष्मीबाई कुशवाह जैसे उदाहरण ने खेती की बदलती तस्वीर को पेश बखूबी पेश किया है. कुछ साल पहले तक वह धान और गेहूं की खेती करती थीं, लेकिन अब गुलाब और जरबेरा के फूलों से हर महीने तीन से चार लाख रुपये तक की कमाई कर रही हैं.
वर्तमान में मध्य प्रदेश में फूलों की खेती में गेंदा टॉपर पर है. यहां किसान 24 हजार हेक्टेयर में गेंदे की खेती कर रहे हैं. इसके बाद गुलाब, सेवन्ती, ग्लेड्युलस और रजनीगंधा जैसे फूल हैं. औषधीय फूलों और फ्लेवर इंडस्ट्री के काम आने वाले विशेष फूलों की खेती भी अब किसान आजमा रहे हैं.
बयान में कहा गया कि मिट्टी की क्वालिटी, सिंचाई सुविधाओं और अनुकूल जलवायु ने इस बदलाव को आसान बनाया है. साथ ही, सरकार की ओर से तकनीकी ट्रेनिंग, नर्सरी और मार्केटिंग सपोर्ट भी किसानों को फूलों की ओर खींच रहा है. ग्वालियर में 13 करोड़ की लागत से बन रही हाईटेक फ्लोरीकल्चर नर्सरी इसी कोशिश का हिस्सा है.
यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है. यह खेती के प्रति सोच में आए उस बदलाव की तस्वीर है, जिसमें किसान खुद को सिर्फ अन्नदाता नहीं, बल्कि एक सफल उद्यमी के रूप में देख रहा है और शायद यही वजह है कि मध्यप्रदेश अब देश के ‘फूल प्रदेश’ के रूप में अपनी नई पहचान की ओर बढ़ रहा है.
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