मटर की खेतीआमतौर पर छिलके वाली मटर का दाना ही खाने में प्रयोग किया जाता है. मटर का छिलका या तो कचरे में फेंक दिया जाता है या पशुओं को खिला दिया जाता है. वहीं, अब भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के द्वारा इसका समाधान खोज लिया गया है. आईआईवीआर की ओर से विकसित नई किस्म ‘काशी तृप्ति’ में पूरी फली यानी दाने और छिलके दोनों खाने योग्य हैं. आइए जानते हैं इस किस्म की अन्य खासितयों के बारे में.
काशी तृप्ति केवल मटर ही नहीं बल्कि स्वाद और सेहत से भरपूर है. इस किस्म की खासियत ये है कि इसके छिलके कोमल, कुरकुरे और बिना कठोर परत के होते हैं. इन्हें सलाद, सूप और स्टर-फ्राई जैसे व्यंजनों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे स्वाद के साथ-साथ पोषण भी बढ़ता है.
‘काशी तृप्ति’ मटर प्रोटीन, विटामिन, आहार फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है. पूरी फली खाने योग्य होने से शरीर को अधिक पोषक तत्व मिलते हैं. यह डायबिटीज, हृदय रोग और अन्य बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायक मानी जाती है.
सामान्य मटर में लगभग 40-45 फीसदी हिस्सा छिलकों के रूप में नष्ट हो जाता है, लेकिन इस नई किस्म में पूरी फली उपयोगी है. इससे भोजन की बर्बादी को रोकने से न केवल संसाधन बचेंगे, बल्कि लोगों को बेहतर और अधिक पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध हो सकेगा.
संस्थान के निदेशक डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, काशी तृप्ति मटर के बीज को मांग के अनुरूप विकसित किया जा रहा है. पूर्वोत्तर के राज्यों में इस मटर की खास मांग है क्योंकि वहां छिलकों के साथ मटर का ज्यादा प्रयोग किया जाता है. आने वाले समय में इस मटर का शहरी क्षेत्र में काफी विस्तार होगा.
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. ज्योति ने बताया इस किस्म को विकसित करने में लगभग 9 वर्ष का समय लगा. वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है, जिससे यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है.
काशी तृप्ति मटर बाजार में बिकने वाली दूसरी मटर से काफी अलग दिखाई देती हैं. यह मटर दिखने में चिपटी है.इसका बीज पूरी तरह से विकसित नहीं होता है जबकि दूसरी मटर पूरी तरह से फूली रहती है .उसके दाने विकसित होते हैं. इसलिए इस मटर को बीज को फली सहित खाया जा सकता है. इसका सलाद के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है जो सेहत के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद बताया गया है.
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ राजेश कुमार ने किसान तक को बताया ‘काशी तृप्ति’ को संकरण और वंशावली चयन पद्धति से तैयार किया गया है. इसमें लंबी, चौड़ी, हरी और बिना कठोर परत वाली फलियों का चयन किया गया, जिससे यह पूरी तरह खाने योग्य बन सकी.
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