कपास उत्पादकता मिशनकॉटन उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने 'कपास उत्पादकता मिशन' शुरू करने का फैसला किया है. वर्ष 2031 तक कपास की उत्पादकता को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर मात्र 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने का सरकारी लक्ष्य रखा गया है. कड़वी बात तो यह है कि यह कोई 'क्रांति' नहीं, बल्कि हमारी सीमित सोच का प्रमाण है. यह लक्ष्य हमारे कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को आईना दिखाने के लिए काफी है कि जब दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है, तब हम रेंगने की योजना बना रहे हैं. यह टारगेट इसलिए हास्यास्पद लगता है क्योंकि चीन की कॉटन उत्पादकता 2200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से ज्यादा हो चुकी है. जो भारत के 2031 के सबसे बड़े सपने से भी तीन गुना अधिक है. चीन का शिनजियांग प्रांत अकेले आधुनिक तकनीकों के दम पर पूरी दुनिया को कपास निर्यात कर रहा है, और हमारे देश के कृषि अनुसंधान संस्थान आज भी दशकों पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं.
बहरहाल, सरकार के ताजा आकलन के मुताबिक, 2025-26 फसल वर्ष में भारत का कपास उत्पादन करीब 291 लाख बेल रहने का अनुमान है. एक बेल में 170 किलोग्राम कपास होती है. मौजूदा समय में भारत की औसत कपास उत्पादकता करीब 440 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो वैश्विक मानकों के लिहाज से काफी कम मानी जाती है. इसी वजह से सरकार मानती है कि जब तक उत्पादकता नहीं बढ़ेगी, तब तक कुल उत्पादन, किसानों की कमाई और टेक्सटाइल सेक्टर—तीनों पर दबाव बना रहेगा.
सरकार ने अपने बयान में साफ किया है कि कपास कांति मिशन का लक्ष्य वर्ष 2031 तक लिंट यानी कपास की उत्पादकता को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाना है. इसके साथ ही कपास का कुल उत्पादन 498 लाख बेल तक ले जाने की योजना है. सरकार का मानना है कि इससे न सिर्फ किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे, बल्कि घरेलू कपास उद्योग भी मजबूत होगा.
कपास को लेकर भारत की चिंता इसलिए भी गहरी है क्योंकि उसे वैश्विक बाजार में चीन से कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ता है. चीन में कपास की उत्पादकता करीब 2200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो भारत से कई गुना ज्यादा है. चीन का शिनजियांग प्रांत अकेले पूरे देश का करीब 90 प्रतिशत कपास उत्पादन करता है और वहीं से पूरी दुनिया में कपास और कपास से बने कपड़े निर्यात किए जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि भारत भी चीन से कपास उत्पादों का आयात करता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन की कपास खेती की ताकत उसकी हाईटेक तकनीक है वहां खेती में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI, सैटेलाइट, ड्रोन और ऑटोमेटिक मशीनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. कपास की फसल में कीट प्रबंधन एक बड़ी चुनौती होती है, खासकर बॉलवर्म जैसे कीट फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं. भारत में पिछली कुछ फसल वर्षों में इसी वजह से उत्पादन और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ा है.
चीन ने इस समस्या का समाधान तकनीक के जरिए किया है. वहां AI आधारित सिस्टम से कीटों की निगरानी की जाती है, जिससे समय रहते कीटनाशक का उपयोग संभव हो पाता है. इसके अलावा, सैटेलाइट गाइडेड सिंचाई के जरिए फसल को जरूरत के मुताबिक पानी दिया जाता है. ड्रोन के जरिए खेतों की निगरानी, GPS आधारित खेती और कपास तोड़ने के लिए ऑटोमेटिक मशीनें—इन सभी तकनीकों ने चीन में कपास की उत्पादकता को नई ऊंचाई दी है.
भारत में अब सरकार इसी मॉडल से प्रेरणा लेकर कपास कांति मिशन को जमीन पर उतारने की तैयारी कर रही है. इस मिशन के तहत रिसर्च और टेक्नोलॉजी को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाएगी. हाई यील्ड बीज, रोग और कीट रोधी किस्मों का विकास किया जाएगा ताकि उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ फसल की क्वालिटी भी सुधरे.
मिशन को सफल बनाने के लिए राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की मदद ली जाएगी. शुरुआती चरण में देश के 14 राज्यों के 140 जिलों को इस अभियान के लिए चुना गया है. इन इलाकों में नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा और करीब 2000 जिनिंग और प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां भी लगाई जाएंगी.
सरकार के मुताबिक, कपास कांति मिशन से करीब 32 लाख किसान सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे. उम्मीद की जा रही है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी, खेती ज्यादा टिकाऊ बनेगी और भारत वैश्विक कपास बाजार में चीन जैसे बड़े खिलाड़ियों को टक्कर देने की स्थिति में आ सकेगा.
कुल मिलाकर, कपास कांति मिशन सिर्फ एक कृषि योजना नहीं, बल्कि भारत की कपास खेती को पारंपरिक ढांचे से बाहर निकालकर तकनीक आधारित भविष्य की ओर ले जाने की कोशिश है. सरकार का भरोसा है कि अगर यह मिशन अपने लक्ष्य हासिल करता है, तो कपास किसानों की तस्वीर और तकदीर—दोनों बदल सकती हैं.
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