होल्ड पर India-US डीलभारत-अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर संशय बरकरार है. यह डील कब तक होगी, अभी कुछ भी साफ नहीं है. डील को लेकर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान पर बीजेपी के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने कहा, "...यह समझौता अभी रुका हुआ है. यह तभी आगे बढ़ेगा जब यह साफ हो जाए कि इससे भारत को फायदा होगा और हमारे लोगों को कोई आर्थिक या किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा.
सरकार का रुख साफ है: अगर समझौता सिर्फ अमेरिका के फायदे में होगा, तो उस पर दस्तखत नहीं किए जाएंगे. इसीलिए इसमें देरी हो रही है. सभी पहलुओं की बारीकी से जांच की जा रही है और भारत इस समझौते में तभी शामिल होगा जब यह पक्का हो जाए कि हमें इससे फायदा होगा."
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को लंदन में कहा कि बातचीत का ज्यादातर हिस्सा पूरा हो चुका है और दोनों पक्ष 6 फरवरी से ही बारीकियों को ठीक कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत भी अपना हित देखेगा तभी डील पर सहमति बनेगी.
उन्होंने कहा कि एक बात अभी भी तय नहीं हो पाई है, लेकिन वह बहुत जरूरी है- भारत चाहता है कि उसे आधिकारिक गारंटी मिले कि अमेरिकी बाजार में उसके एक्सपोर्ट को दूसरे देशों (जो उसके कॉम्पिटिटर हैं) के मुकाबले टैरिफ में फायदा मिलेगा. गोयल ने रॉयटर्स से कहा, "जिस दिन अमेरिका हमें कॉम्पिटिटिव फायदा देने के लिए सही तरीके ढूंढ लेगा, डील पक्की हो जाएगी."
इस देरी के पीछे की मुख्य बात साफ है. भारत यह पक्का करना चाहता है कि अमेरिका को एक्सपोर्ट किए जाने वाले सामान - चाहे वह टेक्सटाइल हो, दवाएं हों या इंजीनियरिंग का सामान - पर वियतनाम या बांग्लादेश जैसे कॉम्पिटिटर देशों से आने वाले ऐसे ही सामान के मुकाबले कम इंपोर्ट ड्यूटी लगे. अगर भारतीय उत्पादों पर भी कॉम्पिटिटर देशों जैसा ही टैरिफ रेट लगता है, तो भारतीय बिजनेस के लिए इस समझौते का आर्थिक महत्व काफी कम हो जाएगा.
गोयल ने इस शर्त के बारे में साफ-साफ कहा. उन्होंने कहा, "जब तक कॉम्पिटिटिव फायदा देने का ढांचा तय नहीं हो जाता, हम अमेरिका के साथ डील नहीं कर सकते." उन्होंने यह भी कहा कि दोनों पक्ष ऐसे कानूनी तरीकों और सिस्टम की पहचान करने पर तेजी से काम कर रहे हैं जिनसे वॉशिंगटन वह गारंटी दे सके.
भारत और अमेरिका के बीच पहले हुई बातचीत में भारतीय सामानों के लिए 18% टैरिफ रेट की बात हुई थी. हालांकि, गोयल ने साफ किया कि यह आंकड़ा हमेशा इस बात पर आधारित था कि भारत को तुलनात्मक फायदा मिले, न कि सभी ट्रेडिंग पार्टनर पर एक जैसा रेट लागू हो. उन्होंने कहा, "जब भारत अमेरिका के साथ 18% टैरिफ रेट पर सहमत हुआ था, तो उसका आधार तुलनात्मक फायदा मिलना ही था."
अगर कॉम्पिटिटर देशों को भी वैसा ही या उससे बेहतर टैरिफ ट्रीटमेंट मिलता है, तो वह समझौता असल में खत्म हो जाएगा और वह वजह भी खत्म हो जाएगी जिसकी वजह से भारत ने शुरुआती रेट को मंजूरी दी थी.
प्रस्तावित समझौते में टैरिफ, ओरिजिन के नियम, निवेश के प्रावधान और कई सेक्टर में बेहतर सहयोग शामिल होने की उम्मीद है. दुनिया की सबसे बड़ी और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सफल डील से भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए बाजार के नए और बड़े मौके खुलेंगे और आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे, जिन्हें मजबूत करने का वादा दोनों सरकारें सार्वजनिक रूप से कर चुकी हैं.
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