केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंदर यादवकेंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत ने 2011 से 2020 के बीच 2.1 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा खराब और पेड़-पौधों से उजड़ चुकी जमीन को फिर से बेहतर बनाने का काम किया है. इस काम से देश में करीब 1.22 अरब व्यक्ति-दिवस रोजगार भी पैदा हुआ. भूपेंद्र यादव ने मंगोलिया में संयुक्त राष्ट्र के मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन के 17वें सत्र यानी CoP17 के दौरान अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के एक कार्यक्रम में यह जानकारी दी.
भूपेंद्र यादव ने कहा कि जमीन को दोबारा बेहतर बनाने से सिर्फ पर्यावरण को फायदा नहीं हुआ, बल्कि लोगों को काम भी मिला और गांवों में रहने वाले लोगों की कमाई के साधन मजबूत हुए. उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव बताता है कि जमीन को बेहतर बनाने के काम से पर्यावरण और लोगों की आजीविका, दोनों को फायदा हो सकता है.
पर्यावरण मंत्री ने कहा कि खराब जमीन को ठीक करने का काम किसी एक योजना या विभाग के भरोसे पूरा नहीं किया जा सकता. इसके लिए गांवों में रहने वाले लोगों, राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को मिलकर काम करना होगा. अलग-अलग योजनाओं के संसाधनों को साथ लाकर बड़े स्तर पर जमीन को फिर से बेहतर बनाया जा सकता है.
भूपेंद्र यादव ने बताया कि ग्रीन इंडिया मिशन के जरिए जंगल और पेड़ों का क्षेत्र बढ़ाने का काम किया जा रहा है. इसके साथ ही पर्यावरण को मजबूत बनाने और बदलते मौसम के असर से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. वहीं, CAMPA के जरिए पेड़ लगाने और जंगलों को फिर से विकसित करने से जुड़े कामों के लिए पैसा दिया जा रहा है.
भूपेंद्र यादव ने कहा कि जमीन को बेहतर बनाने पर होने वाले खर्च को सिर्फ खर्च नहीं समझना चाहिए. यह खेती, पानी, पेड़-पौधों, जानवरों और लोगों की आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए किया गया निवेश है. उन्होंने कहा कि जमीन खराब होने और सूखे जैसी समस्याओं से निपटने के लिए लगातार और भरोसेमंद पैसे की जरूरत है.
पर्यावरण मंत्री ने कहा कि जमीन को बेहतर बनाने के काम में सरकारी पैसे के साथ निजी क्षेत्र के निवेश को भी जोड़ना जरूरी है. उन्होंने ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे तरीकों से पैसा जुटाने के साथ आम लोगों को भी इस काम से जोड़ा जा सकता है. उनके मुताबिक, जमीन सुधारने का काम सरकार के साथ समाज की भागीदारी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत ने अपने संसाधनों से जमीन सुधारने के क्षेत्र में काफी काम किया है. हालांकि, दुनिया के दूसरे देशों से मिलने वाली पर्याप्त और लगातार वित्तीय मदद भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि यह पैसा लगातार मिलना चाहिए, उसका सही इस्तेमाल सुनिश्चित होना चाहिए और उसका फायदा स्थानीय लोगों तक पहुंचना चाहिए.
उन्होंने बताया कि भारत में ग्रीन फाइनेंस के जरिए जलवायु परिवर्तन से निपटने, टिकाऊ खेती, जंगलों, पेड़ लगाने और जैव विविधता बचाने जैसे कामों के लिए पैसा जुटाया जा रहा है.
भूपेंद्र यादव ने बताया कि किसी जमीन पर पांच साल तक सुधार का काम पूरा होने और वहां कम से कम 40 प्रतिशत पेड़-पौधों का आवरण होने के बाद ग्रीन क्रेडिट जारी किए जाते हैं. इन क्रेडिट का इस्तेमाल प्रतिपूरक वनीकरण, जरूरी पौधरोपण या CSR से जुड़े कामों के लिए एक बार किया जा सकता है.
भूपेंद्र यादव ने कहा कि मजबूत संस्थानों, लगातार पैसे, विज्ञान आधारित तरीके और काम की सही निगरानी से बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि भारत दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर बड़े स्तर पर जमीन को फिर से बेहतर बनाने के लिए काम करता रहेगा. (पीटीआई)
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today