
खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ जैविक खाद को आय का जरिया बनाने की दिशा में सागर जिले के बीना विकासखंड के ग्राम बेलई के किसान विवेक दुबे ने प्रेरक पहल शुरू की है. उन्होंने करीब डेढ़ एकड़ जमीन पर वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद निर्माण इकाई विकसित करने का काम शुरू किया है. करीब 40 से 50 लाख रुपये की लागत वाली इस परियोजना का लक्ष्य केवल जैविक खाद तैयार करना नहीं, बल्कि स्थानीय किसानों के लिए एक टिकाऊ और कमाई वाला कृषि-व्यवसाय मॉडल खड़ा करना है.
विवेक दुबे ने इस काम की शुरुआत करने से पहले भोपाल से विशेष प्रशिक्षण लिया. इसके बाद अपने फार्म पर 4×50 फीट और 4×36 फीट आकार के 100 से अधिक वर्मी कम्पोस्ट बेड तैयार किए हैं.उनके अनुसार प्रत्येक बेड से करीब एक से डेढ़ टन तक जैविक खाद तैयार होने की संभावना है.परियोजना पूरी क्षमता से संचालित होने के बाद उनका लक्ष्य प्रतिदिन करीब एक टन जैविक खाद का उत्पादन करना है.
इस उत्पादन को स्थानीय बाजार से जोड़कर आसपास के किसानों को जैविक खाद उपलब्ध कराने की योजना है. इससे किसानों को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण खाद मिल सकेगी और बाहर से खाद खरीदने की जरूरत भी कम हो सकती है.
विवेक दुबे की पहल की खास बात यह है कि उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट को केवल खेती की जरूरत नहीं, बल्कि व्यवसाय और आय के मॉडल के रूप में देखा है.
जैविक खाद की बढ़ती जरूरत के बीच स्थानीय स्तर पर उत्पादन और बिक्री की व्यवस्था तैयार होने से किसान अपनी कृषि गतिविधियों के साथ अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित कर सकते हैं. विवेक का मॉडल दूसरे किसानों को भी यह संदेश देता है कि कृषि से जुड़ी गतिविधियों में प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन जोड़कर कमाई के नए रास्ते बनाए जा सकते हैं.
परियोजना को आगे बढ़ाते हुए विवेक दुबे भविष्य में जैविक डीएपी तैयार करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं.इसमें करीब 10 प्रतिशत फास्फोरस उपलब्धता का लक्ष्य रखा गया है.अगर यह प्रयास सफल होता है तो किसानों को वर्मी कम्पोस्ट के साथ जैव उर्वरक का स्थानीय विकल्प भी उपलब्ध हो सकता है.इससे टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिलने की संभावना है.
वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद उत्पादन की पूरी परियोजना पर करीब 40 से 50 लाख रुपये का निवेश किया जा रहा है. परियोजना को बेहतर तरीके से संचालित करने के लिए विवेक ने प्रशिक्षण के साथ विशेषज्ञों का तकनीकी मार्गदर्शन भी लिया है.
कृषि विज्ञान केंद्र, सागर के वैज्ञानिक आशीष त्रिपाठी और जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के राकेश साहू से उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन मिल रहा है. इससे उत्पादन प्रक्रिया, खाद की गुणवत्ता और यूनिट के संचालन को बेहतर बनाने में मदद मिल रही है.
विवेक दुबे की पहल बताती है कि किसान केवल फसल उत्पादन तक सीमित न रहकर वर्मी कम्पोस्ट, जैविक खाद और जैव उर्वरक जैसे कृषि आधारित व्यवसाय भी विकसित कर सकते हैं.डेढ़ एकड़ में शुरू हुई यह परियोजना अगर अपने लक्ष्य के मुताबिक आगे बढ़ती है, तो बीना क्षेत्र में जैविक खाद उत्पादन और उससे कमाई का एक नया मॉडल बन सकती है.
विवेक की कहानी का संदेश साफ है—खेती में बचने वाले जैविक संसाधनों को सही तकनीक से खाद में बदलें, खेत की लागत घटाएं और कृषि से अतिरिक्त कमाई का रास्ता तैयार करें.
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