चीनी के दाम बढ़ने के पीछे कई वजह जिम्मेदारदेश में चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने एक नई बहस छेड़ दी है. पिछले एक महीने के दौरान चीनी की खुदरा कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो पहुंच गई. हालांकि कई राज्यों और स्थानीय बाजारों में उपभोक्ताओं को 70 से 80 रुपये प्रति किलो तक चीनी खरीदनी पड़ रही है.
चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे अलग-अलग कारण सामने आ रहे हैं. किसान संगठनों का आरोप है कि कुछ व्यापारियों और उद्योग के वर्गों द्वारा जमाखोरी और कृत्रिम कमी पैदा कर मुनाफा कमाया जा रहा है. दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि उत्पादन में कमी, त्योहारी सीजन की बढ़ती मांग, मौसम संबंधी नुकसान, वैश्विक आपूर्ति संकट और बाजार में सट्टेबाजी इसके प्रमुख कारण हैं.
बढ़ती चीनी कीमतों को लेकर महाराष्ट्र में गन्ना किसानों के परिवारों ने पुणे स्थित महाराष्ट्र शुगर कमिश्नर कार्यालय (साखर संकुल) के बाहर प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों की मांग है कि चीनी के बढ़े हुए दामों का लाभ किसानों तक भी पहुंचे.
किसान वैभव मानवतकर ने कहा कि यदि व्यापारी और उद्योग चीनी की ऊंची कीमतों से लाभ कमा रहे हैं तो गन्ना उत्पादकों को भी उसका उचित हिस्सा मिलना चाहिए. प्रदर्शनकारियों ने बकाया बिजली बिल माफ करने, गन्ने की तौल में कथित अनियमितताओं को रोकने और किसानों को बेहतर भुगतान सुनिश्चित करने की मांग की.
महाराष्ट्र के शुगर कमिश्नर संजय कोल्टे ने माना कि इस साल चीनी उत्पादन में गिरावट आई है. उनके अनुसार बारिश और अन्य प्राकृतिक कारणों के चलते गन्ने की उत्पादकता प्रभावित हुई, जिससे चीनी उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम रहा.
उन्होंने यह भी बताया कि इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के उपयोग में वृद्धि हुई है. पिछले साल जहां 15 लाख मीट्रिक टन गन्ना इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल हुआ था, वहीं इस साल यह आंकड़ा बढ़कर 18 लाख मीट्रिक टन हो गया.
हालांकि कोल्टे ने स्पष्ट किया कि सरकार जमाखोरी को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगी. उन्होंने कहा कि सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि गोदामों में रखा गया चीनी स्टॉक सात दिन के भीतर बाजार में लाया जाए ताकि कृत्रिम कमी न पैदा हो.
केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए इथेनॉल कार्यक्रम को मुख्य कारण मानने से इनकार किया है. सरकार का कहना है कि इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन पहले की तुलना में कम हुआ है. 2022-23 में जहां लगभग 12 प्रतिशत चीनी इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हुई थी, वहीं 2025-26 में यह हिस्सा घटकर करीब 9 प्रतिशत रह गया है.
सरकार के मुताबिक अब देश के कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा मक्का सहित अन्य अनाजों से तैयार किया जा रहा है. इसलिए वर्तमान मूल्य वृद्धि का मुख्य कारण चीनी उत्पादन में कमी और बाजार की परिस्थितियां हैं.
सरकार ने शुरू में साल 2025-26 के लिए लगभग 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था. लेकिन बाद में इसे घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया.
सामान्य तौर पर भारत में हर साल 320 से 340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत 280 से 290 लाख टन के बीच रहती है. ऐसे में उत्पादन घटने से बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है और कीमतों पर दबाव बना है.
सरकार का कहना है कि इथेनॉल प्रोग्राम की वजह से चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है और किसानों के भुगतान में भी सुधार आया है. 20 अगस्त 2026 तक 2025-26 सीजन के लगभग 97 प्रतिशत गन्ना बकाया का भुगतान किसानों को किया जा चुका है.
चीनी कीमतों में बढ़ोतरी केवल भारत तक सीमित नहीं है. सरकार के अनुसार वैश्विक स्तर पर भी चीनी उत्पादन दबाव में है. 2026-27 में दुनिया में लगभग 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान लगाया गया है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी के दाम तेजी से बढ़े हैं. 30 जून को चीनी का वैश्विक भाव 474 डॉलर प्रति टन था, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन पहुंच गया. यानी दो महीने से भी कम समय में 16 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई.
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने चीनी उत्पादन में गिरावट के लिए रेड रॉट बीमारी और अल नीनो को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा कि इन कारणों से केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है.
जोशी के अनुसार भारत की वार्षिक चीनी आवश्यकता लगभग 280 लाख टन है और वर्तमान में देश के पास 20 से 25 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक मौजूद है. सरकार घरेलू उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए हालात पर लगातार नजर रखे हुए है.
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति में सबसे अधिक लाभ उन व्यापारियों और स्टॉकिस्टों को हो सकता है जिनके पास पहले से चीनी का बड़ा भंडार मौजूद है. वहीं चीनी मिलों को भी ऊंचे बाजार भाव से अतिरिक्त आय मिलने की संभावना है. दूसरी तरफ किसान संगठनों का तर्क है कि यदि बाजार में चीनी महंगी बिक रही है तो गन्ना उत्पादकों को भी अधिक मूल्य मिलना चाहिए.
फिलहाल चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार, किसान संगठनों और उद्योग के बीच बहस जारी है. आने वाले त्योहारों के मौसम में मांग और बढ़ने की संभावना है, जिससे बाजार और नीति निर्माताओं दोनों की चुनौती बढ़ सकती है.
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