भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाटभारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक और कृषि अनुसंधान शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव डॉ. एम. एल जाट ने ‘किसान तक’ से विशेष बातचीत में कहा कि अब देश को क्लाइमेट रेजिलेंट फार्मिंग सिस्टम पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान में पहली बार, और शायद एशिया में भी पहली बार, किसानों को कार्बन क्रेडिट फसलों के माध्यम से सीधा लाभ मिलने जा रहा है.
डॉ. जाट ने कहा कि पंजाब और हरियाणा में इस पहल की शुरुआत हो चुकी है, जहां लगभग 50,000 कार्बन क्रेडिट किसानों को मिलने वाले हैं. आने वाले समय में इसे अन्य राज्यों तक विस्तारित किया जाएगा.
डॉ. जाट ने कहा कि जिन किसानों ने क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर, रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर और लो-एमिशन कृषि पद्धतियां अपनाई हैं, उनकी उत्पादन लागत में कमी आई है. क्लाइमेट रेजिलेंट खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक लाभ का अवसर भी बन रही है. इससे न केवल लागत घटती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के साथ आय में भी बढ़ोतरी संभव है. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अधिक से अधिक किसान क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर प्रैक्टिस को अपनाएं.
डॉ. एम. एल जाट ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) को मिलकर क्लाइमेट एक्शन की दिशा में ठोस कार्य करना होगा. देश में क्लाइमेट रेजिलेंट फसल किस्मों और जलवायु-अनुकूल पशुधन नस्लों पर लगातार अनुसंधान किया जा रहा है. इसके साथ ही क्लाइमेट टेक्नोलॉजी, विशेषकर वाटर कंजर्वेशन और सॉइल कंजर्वेशन को कृषि प्रणाली से जोड़ना बेहद आवश्यक है.
उन्होंने कहा कि जल संरक्षण, वाटर हार्वेस्टिंग और मृदा संरक्षण पर पहले से काम हो रहा है, लेकिन हाल ही में शुरू की गई योजनाओं में किसानों के लिए कई नई संभावनाएं हैं. यदि किसान इनका सही उपयोग करें तो वे अपनी खेती को अधिक जलवायु-लचीला (क्लाइमेट रेजिलेंट) बना सकते हैं.
डॉ. जाट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण केवल किसानों या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का दायित्व है. उन्होंने कहा कि क्लाइमेट चेंज का प्रभाव केवल कृषि पर नहीं, बल्कि पूरे समाज और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. वाहनों से होने वाला उत्सर्जन भी जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करता है. एग्रीकल्चर एक ऐसा सेक्टर है जो क्लाइमेट चेंज में योगदान भी देता है और उससे प्रभावित भी होता है. इसलिए उत्सर्जन कम करने और क्लाइमेट रेजिलिएंस बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं.
डॉ. एम. एल जाट ने कहा कि यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए समाज के हर वर्ग को कार्रवाई करनी होगी. उत्सर्जन में कमी, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना समय की मांग है. उन्होंने विश्वास जताया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, नई तकनीकों और किसानों की भागीदारी से भारत क्लाइमेट रेजिलेंट कृषि की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकता है.
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